आसमानों पे फ़क़त चाँद सितारे निकले
मेरी आँखों में तो तुम इन से भी प्यारे निकले
अपने जैसी कोई तस्वीर बनानी थी मुझे
मिरे अंदर से सभी रंग तुम्हारे निकले
हम ने महसूस किया ही था तुझे आज की शाम
जो हुई रात तो पलकों पे सितारे निकले
मुझ में इक रोज़ कोई क़त्ल हुआ था और फिर
मेरी आँखों से बहुत ख़ून के धारे निकले
मैं ने सोचा था कि नम-ख़ुर्दा है मेरी मिट्टी
छू के देखा तो तह-ए-ख़ाक शरारे निकले ।
सालिम सलीम ✍️

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