अहमद फ़राज़ की कुछ चुनिंदा नज़्में/ ग़ज़ल :
(उर्दू नज़्म/ग़ज़ल इन हिन्दी)
- भली सी एक शक्ल थी
- वापसी
- मत क़त्ल करो आवाज़ों को
- ईद-कार्ड
- हमदर्द
- बन-बास
- सफ़ेद छड़ियाँ
- दीवार-ए-गिर्या
- सवाल
- न दिल से आह न लब से सदा निकलती है
- ये आलम शौक़ का देखा न जाए
- न मंज़िलों को न हम रहगुज़र को देखते हैं
- जो ग़ैर थे वो इसी बात पर हमारे हुए
- अब शौक़ से कि जाँ से गुज़र जाना चाहिए
- जब भी दिल खोल के रोए होंगे
- जिस से ये तबीअत बड़ी मुश्किल से लगी थी
- फ़क़ीह-ए-शहर की मज्लिस से कुछ भला न हुआ
- सिलसिले तोड़ गया वो सभी जाते जाते
- ज़िंदगी से यही गिला है मुझे
- इस से पहले कि बे-वफ़ा हो जाएँ
- अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें
- रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ
- सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं
- दुख फ़साना नहीं कि तुझ से कहें
- अभी कुछ और करिश्मे ग़ज़ल के देखते हैं
1. भली सी एक शक्ल थी
भले दिनों की बात है
भली सी एक शक्ल थी
न ये कि हुस्न-ए-ताम हो
न देखने में आम सी
न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे
मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे
कोई भी रुत हो उस की छब
फ़ज़ा का रंग-रूप थी
वो गर्मियों की छाँव थी
वो सर्दियों की धूप थी
न मुद्दतों जुदा रहे
न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो
न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद
न ये कि इज़्न-ए-आम हो
न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ
कि सादगी गिला करे
न इतनी बे-तकल्लुफ़ी
कि आइना हया करे
न इख़्तिलात में वो रम
कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें
न इस क़दर सुपुर्दगी
कि ज़च करें नवाज़िशें
न आशिक़ी जुनून की
कि ज़िंदगी अज़ाब हो
न इस क़दर कठोर-पन
कि दोस्ती ख़राब हो
कभी तो बात भी ख़फ़ी
कभी सुकूत भी सुख़न
कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ
कभी उदासियों का बन
सुना है एक उम्र है
मुआमलात-ए-दिल की भी
विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या
फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी
सो एक रोज़ क्या हुआ
वफ़ा पे बहस छिड़ गई
मैं इश्क़ को अमर कहूँ
वो मेरी ज़िद से चिड़ गई
मैं इश्क़ का असीर था
वो इश्क़ को क़फ़स कहे
कि उम्र भर के साथ को
वो बद-तर-अज़-हवस कहे
शजर हजर नहीं कि हम
हमेशा पा-ब-गिल रहें
न ढोर हैं कि रस्सियाँ
गले में मुस्तक़िल रहें
मोहब्बतों की वुसअतें
हमारे दस्त-ओ-पा में हैं
बस एक दर से निस्बतें
सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं
मैं कोई पेंटिंग नहीं
कि इक फ़्रेम में रहूँ
वही जो मन का मीत हो
उसी के प्रेम में रहूँ
तुम्हारी सोच जो भी हो
मैं उस मिज़ाज की नहीं
मुझे वफ़ा से बैर है
ये बात आज की नहीं
न उस को मुझ पे मान था
न मुझ को उस पे ज़ोम ही
जो अहद ही कोई न हो
तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी
सो अपना अपना रास्ता
हँसी-ख़ुशी बदल दिया
वो अपनी राह चल पड़ी
मैं अपनी राह चल दिया
भली सी एक शक्ल थी
भली सी उस की दोस्ती
अब उस की याद रात दिन
नहीं, मगर कभी कभी ।
2. वापसी
उस ने कहा
सुन
अहद निभाने की ख़ातिर मत आना
अहद निभाने वाले अक्सर
मजबूरी या महजूरी की थकन से लौटा करते हैं
तुम जाओ
और दरिया दरिया प्यास बुझाओ
जिन आँखों में डूबो
जिस दिल में उतरो
मेरी तलब आवाज़ न देगी
लेकिन जब मेरी चाहत
और मिरी ख़्वाहिश की लौ
इतनी तेज़ और इतनी
ऊँची हो जाए
जब दिल रो दे
तब लौट आना ।
3. मत क़त्ल करो आवाज़ों को
तुम अपने अक़ीदों के नेज़े
हर दिल में उतारे जाते हो
हम लोग मोहब्बत वाले हैं
तुम ख़ंजर क्यूँ लहराते हो
इस शहर में नग़्मे बहने दो
बस्ती में हमें भी रहने दो
हम पालनहार हैं फूलों के
हम ख़ुश्बू के रखवाले हैं
तुम किस का लहू पीने आए
हम प्यार सिखाने वाले हैं
इस शहर में फिर क्या देखोगे
जब हर्फ़ यहाँ मर जाएगा
जब तेग़ पे लय कट जाएगी
जब शेर सफ़र कर जाएगा
जब क़त्ल हुआ सुर साज़ों का
जब काल पड़ा आवाज़ों का
जब शहर खंडर बन जाएगा
फिर किस पर संग उठाओगे ।
अपने चेहरे आईनों में
जब देखोगे डर जाओगे ।
4. ईद-कार्ड
तुझ से बिछड़ कर भी ज़िंदा था
मर मर कर ये ज़हर पिया है
चुप रहना आसान नहीं था
बरसों दिल का ख़ून किया है
जो कुछ गुज़री जैसी गुज़री
तुझ को कब इल्ज़ाम दिया है
अपने हाल पे ख़ुद रोया हूँ
ख़ुद ही अपना चाक सिया है
कितनी जाँकाही से मैं ने
तुझ को दिल से महव किया है
सन्नाटे की झील में तू ने
फिर क्यूँ पत्थर फेंक दिया है ।
5. हमदर्द
ऐ दिल उन आँखों पर न जा
जिन में वफ़ूर-ए-रंज से
कुछ देर को तेरे लिए
आँसू अगर लहरा गए
ये चंद लम्हों की चमक
जो तुझ को पागल कर गई
इन जुगनुओं के नूर से
चमकी है कब वो ज़िंदगी
जिस के मुक़द्दर में रही
सुब्ह-ए-तलब से तीरगी
किस सोच में गुम-सुम है तू
ऐ बे-ख़बर नादाँ न बन
तेरी फ़सुर्दा रूह को
चाहत के काँटों की तलब
और उस के दामन में फ़क़त
हमदर्दियों के फूल हैं ।
6. बन-बास
मेरे शहर के सारे रस्ते बंद हैं लोगो
मैं इस शहर का नग़्मा-गर
जो दो इक मौसम ग़ुर्बत के दुख झेल के आया
ताकि अपने घर की दीवारों से
अपनी थकी हुई और तरसी हुई
आँखें सहलाऊँ
अपने दरवाज़े के उतरते रोग़न को
अपने अश्कों से सैक़ल कर लूँ
अपने चमन के जले हुए पौदों
और गर्द-आलूद दरख़्तों की
मुर्दा शाख़ों पर बैन करूँ
हर महजूर सुतून को इतना टूट के चूमूँ
मेरे लबों के ख़ून से
उन के नक़्श-ओ-निगार सभी जी उठें
गली के लोगों को इतना देखूँ
इतना देखूँ
मेरी आँखें
बरसों की तरसी हुई आँखें
चेहरों के आँगन बन जाएँ
फिर मैं अपना साज़ उठाऊँ
आँसुओं और मुस्कानों से झिलमिल झिलमिल
नज़्में ग़ज़लें गीत सुनाऊँ
अपने प्यारों
दर्द के मारों का दरमाँ बन जाऊँ
लेकिन मेरे शहर के सारे रस्तों पर
अब बाड़ है लोहे के काँटों की
शह दरवाज़े पर कुछ पहरे-दार खड़े हैं
जो मुझ से और मुझ जैसे दिल वालों की
पहचान से आरी
मेरे साज़ से
संगीनों से बात करें
मैं उन से कहता हूँ
देखो
मैं इस शहर का नग़्मा-गर हूँ
बरसों बा'द कड़ी राहों की
सारी अज़िय्यत झेल के अब वापस आया हूँ
उस मिट्टी की ख़ातिर
जिस की ख़ुशबुएँ
दुनिया भर की दो-शीज़ाओं के जिस्मों की महकों से
और सारे जहाँ के
सभी गुलाबों से
बढ़ कर है
मुझ को शहर में
मेरे शहर में जाने दो
लेकिन तने हुए नेज़ों ने
मेरे जिस्म को यूँ बर्माया
मेरे साज़ को यूँ रेज़ाया
मेरा हुमकता ख़ून और मेरे सिसकते नग़्मे
शह-दरवाज़े की दहलीज़ से
रिसते रिसते
शहर के अंदर जा पहुँचे हैं
और मैं अपने जिस्म का मलबा
साज़ का लाशा
अपने शहर के शह-दरवाज़े
की दहलीज़ पे छोड़ के
फिर अनजाने शहरों की शहराहों पर
मजबूर-ए-सफ़र हूँ
जिन को तज कर घर आया था
जिन को तज कर घर आया था ।
7. सफ़ेद छड़ियाँ
जनम का अंधा
जो सोच और सच के रास्तों पर
कभी कभी कोई ख़्वाब देखे
तो ख़्वाब में भी
अज़ाब देखे
ये शाहराह-ए-हयात जिस पर
हज़ार-हा क़ाफ़िले रवाँ हैं
सभी की आँखें
हर एक का दिल
सभी के रस्ते
सभी की मंज़िल
इसी हुजूम-ए-कशाँ-कशाँ में
तमाम चेहरों की दास्ताँ में
न नाम मेरा
न ज़ात मेरी
मिरा क़बीला
सफ़ेद छड़ियाँ ।
8. दीवार-ए-गिर्या
वो कैसा शोबदा-गर था
जो मसनूई सितारों
और नक़ली सूरजों की
इक झलक दिखला के
मेरे सादा दिल लोगों
की आँखों के दिए
होंटों के जुगनू
ले गया
और अब ये आलम है
कि मेरे शहर का
हर इक मकाँ
इक ग़ार की मानिंद
महरूम-ए-नवा है
और हँसता बोलता हर शख़्स
इक दीवार-ए-गिर्या है ।
9. सवाल
इक संग तराश जिस ने बरसों
हीरों की तरह सनम तराशे
आज अपने सनम-कदे में तन्हा
मजबूर निढाल ज़ख़्म-ख़ुर्दा
दिन रात पड़ा कराहता है
चेहरे पे उजाड़ ज़िंदगी के
लम्हात की अन-गिनत ख़राशें
आँखों के शिकस्ता मरक़दों में
रूठी हुई हसरतों की लाशें
साँसों की थकन बदन की ठंडक
एहसास से कब तलक लहू ले
हाथों में कहाँ सकत कि बढ़ कर
ख़ुद-साख़्ता पैकराँ को छू ले
ये ज़ख़्म-ए-तलब ये ना-मुरादी
हर बुत के लबों पे है तबस्सुम
ऐ तेशा-ब-दस्त देवताओ!
तख़्लीक़ अज़ीम है कि ख़ालिक़
इंसान जवाब चाहता है ।
10. न दिल से आह न लब से सदा निकलती है
न दिल से आह न लब से सदा निकलती है
मगर ये बात बड़ी दूर जा निकलती है
सितम तो ये है कि अहद-ए-सितम के जाते ही
तमाम ख़ल्क़ मिरी हम-नवा निकलती है
विसाल-ओ-हिज्र की हसरत में जू-ए-कम-माया
कभी कभी किसी सहरा में जा निकलती है
मैं क्या करूँ मिरे क़ातिल न चाहने पर भी
तिरे लिए मिरे दिल से दुआ निकलती है
वो ज़िंदगी हो कि दुनिया 'फ़राज़' क्या कीजे
कि जिस से इश्क़ करो बेवफ़ा निकलती है ।
11. ये आलम शौक़ का देखा न जाए
ये आलम शौक़ का देखा न जाए
वो बुत है या ख़ुदा देखा न जाए
ये किन नज़रों से तू ने आज देखा
कि तेरा देखना देखा न जाए
हमेशा के लिए मुझ से बिछड़ जा
ये मंज़र बार-हा देखा न जाए
ग़लत है जो सुना पर आज़मा कर
तुझे ऐ बेवफ़ा देखा न जाए
ये महरूमी नहीं पास-ए-वफ़ा है
कोई तेरे सिवा देखा न जाए
यही तो आश्ना बनते हैं आख़िर
कोई ना-आश्ना देखा न जाए
ये मेरे साथ कैसी रौशनी है
कि मुझ से रास्ता देखा न जाए
'फ़राज़' अपने सिवा है कौन तेरा
तुझे तुझ से जुदा देखा न जाए ।
12. न मंज़िलों को न हम रहगुज़र को देखते हैं
न मंज़िलों को न हम रहगुज़र को देखते हैं
अजब सफ़र है कि बस हम-सफ़र को देखते हैं
न पूछ जब वो गुज़रता है बे-नियाज़ी से
तो किस मलाल से हम नामा-बर को देखते हैं
तिरे जमाल से हट कर भी एक दुनिया है
ये सेर-चश्म मगर कब उधर को देखते हैं
अजब फ़ुसून-ए-ख़रीदार का असर है कि हम
उसी की आँख से अपने हुनर को देखते हैं
'फ़राज़' दर-ख़ुर-ए-सज्दा हर आस्ताना नहीं
हम अपने दिल के हवाले से दर को देखते हैं ।
13. जो ग़ैर थे वो इसी बात पर हमारे हुए
जो ग़ैर थे वो इसी बात पर हमारे हुए
कि हम से दोस्त बहुत बे-ख़बर हमारे हुए
किसे ख़बर वो मोहब्बत थी या रक़ाबत थी
बहुत से लोग तुझे देख कर हमारे हुए
अब इक हुजूम-ए-शिकस्ता-दिलाँ है साथ अपने
जिन्हें कोई न मिला हम-सफ़र हमारे हुए
किसी ने ग़म तो किसी ने मिज़ाज-ए-ग़म बख़्शा
सब अपनी अपनी जगह चारागर हमारे हुए
बुझा के ताक़ की शमएँ न देख तारों को
इसी जुनूँ में तो बर्बाद घर हमारे हुए
वो ए'तिमाद कहाँ से 'फ़राज़' लाएँगे
किसी को छोड़ के वो अब अगर हमारे हुए ।
14. अब शौक़ से कि जाँ से गुज़र जाना चाहिए
अब शौक़ से कि जाँ से गुज़र जाना चाहिए
बोल ऐ हवा-ए-शहर किधर जाना चाहिए
कब तक इसी को आख़िरी मंज़िल कहेंगे हम
कू-ए-मुराद से भी उधर जाना चाहिए
वो वक़्त आ गया है कि साहिल को छोड़ कर
गहरे समुंदरों में उतर जाना चाहिए
अब रफ़्तगाँ की बात नहीं कारवाँ की है
जिस सम्त भी हो गर्द-ए-सफ़र जाना चाहिए
कुछ तो सुबूत-ए-ख़ून-ए-तमन्ना कहीं मिले
है दिल तही तो आँख को भर जाना चाहिए
या अपनी ख़्वाहिशों को मुक़द्दस न जानते
या ख़्वाहिशों के साथ ही मर जाना चाहिए ।
15. जब भी दिल खोल के रोए होंगे
जब भी दिल खोल के रोए होंगे
लोग आराम से सोए होंगे
बाज़ औक़ात ब-मजबूरी-ए-दिल
हम तो क्या आप भी रोए होंगे
सुब्ह तक दस्त-ए-सबा ने क्या क्या
फूल काँटों में पिरोए होंगे
वो सफ़ीने जिन्हें तूफ़ाँ न मिले
ना-ख़ुदाओं ने डुबोए होंगे
रात भर हँसते हुए तारों ने
उन के आरिज़ भी भिगोए होंगे
क्या अजब है वो मिले भी हों 'फ़राज़'
हम किसी ध्यान में खोए होंगे ।
16. जिस से ये तबीअत बड़ी मुश्किल से लगी थी
जिस से ये तबीअत बड़ी मुश्किल से लगी थी
देखा तो वो तस्वीर हर इक दिल से लगी थी
तन्हाई में रोते हैं कि यूँ दिल को सुकूँ हो
ये चोट किसी साहब-ए-महफ़िल से लगी थी
ऐ दिल तिरे आशोब ने फिर हश्र जगाया
बेदर्द अभी आँख भी मुश्किल से लगी थी
ख़िल्क़त का अजब हाल था उस कू-ए-सितम में
साए की तरह दामन-ए-क़ातिल से लगी थी
उतरा भी तो कब दर्द का चढ़ता हुआ दरिया
जब कश्ती-ए-जाँ मौत के साहिल से लगी थी ।
17. फ़क़ीह-ए-शहर की मज्लिस से कुछ भला न हुआ
फ़क़ीह-ए-शहर की मज्लिस से कुछ भला न हुआ
कि उस से मिल के मिज़ाज और काफ़िराना हुआ
अभी अभी वो मिला था हज़ार बातें कीं
अभी अभी वो गया है मगर ज़माना हुआ
वो रात भूल चुको वो सुख़न न दोहराओ
वो रात ख़्वाब हुई वो सुख़न फ़साना हुआ
कुछ अब के ऐसे कड़े थे फ़िराक़ के मौसम
तिरी ही बात नहीं मैं भी क्या से क्या न हुआ
हुजूम ऐसा कि राहें नज़र नहीं आतीं
नसीब ऐसा कि अब तक तो क़ाफ़िला न हुआ
शहीद-ए-शब फ़क़त अहमद-'फ़राज़' ही तो नहीं
कि जो चराग़-ब-कफ़ था वही निशाना हुआ ।
18. सिलसिले तोड़ गया वो सभी जाते जाते
सिलसिले तोड़ गया वो सभी जाते जाते
वर्ना इतने तो मरासिम थे कि आते जाते
शिकवा-ए-ज़ुल्मत-ए-शब से तो कहीं बेहतर था
अपने हिस्से की कोई शम्अ' जलाते जाते
कितना आसाँ था तिरे हिज्र में मरना जानाँ
फिर भी इक उम्र लगी जान से जाते जाते
जश्न-ए-मक़्तल ही न बरपा हुआ वर्ना हम भी
पा-ब-जौलाँ ही सही नाचते गाते जाते
इस की वो जाने उसे पास-ए-वफ़ा था कि न था
तुम 'फ़राज़' अपनी तरफ़ से तो निभाते जाते ।
19. ज़िंदगी से यही गिला है मुझे
ज़िंदगी से यही गिला है मुझे
तू बहुत देर से मिला है मुझे
तू मोहब्बत से कोई चाल तो चल
हार जाने का हौसला है मुझे
दिल धड़कता नहीं टपकता है
कल जो ख़्वाहिश थी आबला है मुझे
हम-सफ़र चाहिए हुजूम नहीं
इक मुसाफ़िर भी क़ाफ़िला है मुझे
कोहकन हो कि क़ैस हो कि 'फ़राज़'
सब में इक शख़्स ही मिला है मुझे ।
20. इस से पहले कि बे-वफ़ा हो जाएँ
इस से पहले कि बे-वफ़ा हो जाएँ
क्यूँ न ऐ दोस्त हम जुदा हो जाएँ
तू भी हीरे से बन गया पत्थर
हम भी कल जाने क्या से क्या हो जाएँ
तू कि यकता था बे-शुमार हुआ
हम भी टूटें तो जा-ब-जा हो जाएँ
हम भी मजबूरियों का उज़्र करें
फिर कहीं और मुब्तला हो जाएँ
हम अगर मंज़िलें न बन पाए
मंज़िलों तक का रास्ता हो जाएँ
देर से सोच में हैं परवाने
राख हो जाएँ या हवा हो जाएँ
इश्क़ भी खेल है नसीबों का
ख़ाक हो जाएँ कीमिया हो जाएँ
अब के गर तू मिले तो हम तुझ से
ऐसे लिपटें तिरी क़बा हो जाएँ
बंदगी हम ने छोड़ दी है 'फ़राज़'
क्या करें लोग जब ख़ुदा हो जाएँ ।
21. अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें
अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें
जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें
ढूँढ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती
ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें
ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो
नश्शा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें
तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा
दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँ इतने हिजाबों में मिलें
आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर
क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें
अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़'
जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें ।
22. रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ
रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ
कुछ तो मिरे पिंदार-ए-मोहब्बत का भरम रख
तू भी तो कभी मुझ को मनाने के लिए आ
पहले से मरासिम न सही फिर भी कभी तो
रस्म-ओ-रह-ए-दुनिया ही निभाने के लिए आ
किस किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम
तू मुझ से ख़फ़ा है तो ज़माने के लिए आ
इक 'उम्र से हूँ लज़्ज़त-ए-गिर्या से भी महरूम
ऐ राहत-ए-जाँ मुझ को रुलाने के लिए आ
अब तक दिल-ए-ख़ुश-फ़ह्म को तुझ से हैं उमीदें
ये आख़िरी शम'एँ भी बुझाने के लिए आ ।
23. सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं
सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं
सो उस के शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं
सुना है रब्त है उस को ख़राब-हालों से
सो अपने आप को बरबाद कर के देखते हैं
सुना है दर्द की गाहक है चश्म-ए-नाज़ उस की
सो हम भी उस की गली से गुज़र के देखते हैं
सुना है उस को भी है शेर ओ शाइरी से शग़फ़
सो हम भी मो'जिज़े अपने हुनर के देखते हैं
सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं
ये बात है तो चलो बात कर के देखते हैं
सुना है रात उसे चाँद तकता रहता है
सितारे बाम-ए-फ़लक से उतर के देखते हैं
सुना है दिन को उसे तितलियाँ सताती हैं
सुना है रात को जुगनू ठहर के देखते हैं
सुना है हश्र हैं उस की ग़ज़ाल सी आँखें
सुना है उस को हिरन दश्त भर के देखते हैं
सुना है रात से बढ़ कर हैं काकुलें उस की
सुना है शाम को साए गुज़र के देखते हैं
सुना है उस की सियह-चश्मगी क़यामत है
सो उस को सुरमा-फ़रोश आह भर के देखते हैं
सुना है उस के लबों से गुलाब जलते हैं
सो हम बहार पे इल्ज़ाम धर के देखते हैं
सुना है आइना तिमसाल है जबीं उस की
जो सादा दिल हैं उसे बन-सँवर के देखते हैं
सुना है जब से हमाइल हैं उस की गर्दन में
मिज़ाज और ही लाल ओ गुहर के देखते हैं
सुना है चश्म-ए-तसव्वुर से दश्त-ए-इम्काँ में
पलंग ज़ाविए उस की कमर के देखते हैं
सुना है उस के बदन की तराश ऐसी है
कि फूल अपनी क़बाएँ कतर के देखते हैं
वो सर्व-क़द है मगर बे-गुल-ए-मुराद नहीं
कि उस शजर पे शगूफ़े समर के देखते हैं
बस इक निगाह से लुटता है क़ाफ़िला दिल का
सो रह-रवान-ए-तमन्ना भी डर के देखते हैं
सुना है उस के शबिस्ताँ से मुत्तसिल है बहिश्त
मकीं उधर के भी जल्वे इधर के देखते हैं
रुके तो गर्दिशें उस का तवाफ़ करती हैं
चले तो उस को ज़माने ठहर के देखते हैं
किसे नसीब कि बे-पैरहन उसे देखे
कभी कभी दर ओ दीवार घर के देखते हैं
कहानियाँ ही सही सब मुबालग़े ही सही
अगर वो ख़्वाब है ताबीर कर के देखते हैं
अब उस के शहर में ठहरें कि कूच कर जाएँ
'फ़राज़' आओ सितारे सफ़र के देखते हैं ।
24. दुख फ़साना नहीं कि तुझ से कहें
दुख फ़साना नहीं कि तुझ से कहें
दिल भी माना नहीं कि तुझ से कहें
आज तक अपनी बेकली का सबब
ख़ुद भी जाना नहीं कि तुझ से कहें
बे-तरह हाल-ए-दिल है और तुझ से
दोस्ताना नहीं कि तुझ से कहें
एक तू हर्फ़-ए-आश्ना था मगर
अब ज़माना नहीं कि तुझ से कहें
क़ासिदा हम फ़क़ीर लोगों का
इक ठिकाना नहीं कि तुझ से कहें
ऐ ख़ुदा दर्द-ए-दिल है बख़्शिश-ए-दोस्त
आब-ओ-दाना नहीं कि तुझ से कहें
अब तो अपना भी उस गली में 'फ़राज़'
आना जाना नहीं कि तुझ से कहें ।
25. अभी कुछ और करिश्मे ग़ज़ल के देखते हैं
अभी कुछ और करिश्मे ग़ज़ल के देखते हैं
'फ़राज़' अब ज़रा लहजा बदल के देखते हैं
जुदाइयाँ तो मुक़द्दर हैं फिर भी जान-ए-सफ़र
कुछ और दूर ज़रा साथ चल के देखते हैं
रह-ए-वफ़ा में हरीफ़-ए-ख़िराम कोई तो हो
सो अपने आप से आगे निकल के देखते हैं
तू सामने है तो फिर क्यूँ यक़ीं नहीं आता
ये बार बार जो आँखों को मल के देखते हैं
ये कौन लोग हैं मौजूद तेरी महफ़िल में
जो लालचों से तुझे मुझ को जल के देखते हैं
ये क़ुर्ब क्या है कि यक-जाँ हुए न दूर रहे
हज़ार एक ही क़ालिब में ढल के देखते हैं
न तुझ को मात हुई है न मुझ को मात हुई
सो अब के दोनों ही चालें बदल के देखते हैं
ये कौन है सर-ए-साहिल कि डूबने वाले
समुंदरों की तहों से उछल के देखते हैं
अभी तलक तो न कुंदन हुए न राख हुए
हम अपनी आग में हर रोज़ जल के देखते हैं
बहुत दिनों से नहीं है कुछ उस की ख़ैर-ख़बर
चलो 'फ़राज़' को ऐ यार चल के देखते हैं ।




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