Friday, May 8, 2026

मिरे ठहराव को कुछ और भी वुसअत दी जाए

मिरे ठहराव को  कुछ और भी वुसअत दी जाए
अब मुझे ख़ुद से निकलने की इजाज़त दी जाए

मौत  से  मिल  लें   किसी   गोशा-ए-तन्हाई  में
ज़िंदगी  से  जो  किसी  दिन हमें फ़ुर्सत दी जाए

बे-ख़द-ओ-ख़ाल सा इक चेहरा लिए फिरता हूँ
चाहता हूँ कि मुझे शक्ल-ओ-शबाहत  दी जाए

भरे  बाज़ार   में  बैठा  हूँ  लिए  जिंस-ए-वजूद
शर्त  ये  है  कि मिरी ख़ाक की क़ीमत दी  जाए

बस  कि  दुनिया  मिरी  आँखों  में समा जाएगी
कोई दिन और मिरे ख़्वाब को मोहलत दी जाए ।



सालिम सलीम✍️





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