जीवन-वृत्त :
✒️मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग- 2
मुझसे पहली-सी मुहब्बत मिरे महबूब न मांग
मैनें समझा था कि तू है तो दरख़शां है हयात
तेरा ग़म है तो ग़मे-दहर का झगड़ा क्या है
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात
तेरी आखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है
तू जो मिल जाये तो तकदीर नगूं हो जाये
यूं न था, मैनें फ़कत चाहा था यूं हो जाये
और भी दुख हैं ज़माने में मुहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वसल की राहत के सिवा
अनगिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिसम
रेशमो-अतलसो-किमख्वाब में बुनवाए हुए
जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म
ख़ाक में लिबड़े हुए, ख़ून में नहलाये हुए
जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से
पीप बहती हुयी गलते हुए नासूरों से
लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे
अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे
और भी दुख हैं ज़माने में मुहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वसल की राहत के सिवा
मुझसे पहली-सी मुहब्बत मिरे महबूब न मांग ।
✒️बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे -3
बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे
बोल ज़बाँ अब तक तेरी है
तेरा सुत्वाँ जिस्म है तेरा
बोल कि जाँ अब तक तेरी है
देख कि आहन-गर की दुकाँ में
तुंद हैं शोले सुर्ख़ है आहन
खुलने लगे क़ुफ़्लों के दहाने
फैला हर इक ज़ंजीर का दामन
बोल ये थोड़ा वक़्त बहुत है
जिस्म ओ ज़बाँ की मौत से पहले
बोल कि सच ज़िंदा है अब तक
बोल जो कुछ कहना है कह ले ।
✒️निसार मैं तेरी गलियों के ऐ वतन कि जहाँ -4
निसार मैं तिरी गलियों के ऐ वतन कि जहाँ
चली है रस्म कि कोई न सर उठा के चले
जो कोई चाहने वाला तवाफ़ को निकले
नज़र चुरा के चले जिस्म ओ जाँ बचा के चले
है अहल-ए-दिल के लिए अब ये नज़्म-ए-बस्त-ओ-कुशाद
कि संग-ओ-ख़िश्त मुक़य्यद हैं और सग आज़ाद
बहुत है ज़ुल्म के दस्त-ए-बहाना-जू के लिए
जो चंद अहल-ए-जुनूँ तेरे नाम-लेवा हैं
बने हैं अहल-ए-हवस मुद्दई भी मुंसिफ़ भी
किसे वकील करें किस से मुंसिफ़ी चाहें
मगर गुज़ारने वालों के दिन गुज़रते हैं
तिरे फ़िराक़ में यूँ सुब्ह ओ शाम करते हैं
बुझा जो रौज़न-ए-ज़िंदाँ तो दिल ये समझा है
कि तेरी माँग सितारों से भर गई होगी
चमक उठे हैं सलासिल तो हम ने जाना है
कि अब सहर तिरे रुख़ पर बिखर गई होगी
ग़रज़ तसव्वुर-ए-शाम-ओ-सहर में जीते हैं
गिरफ़्त-ए-साया-ए-दीवार-ओ-दर में जीते हैं
यूँही हमेशा उलझती रही है ज़ुल्म से ख़ल्क़
न उन की रस्म नई है न अपनी रीत नई
यूँही हमेशा खिलाए हैं हम ने आग में फूल
न उन की हार नई है न अपनी जीत नई
इसी सबब से फ़लक का गिला नहीं करते
तिरे फ़िराक़ में हम दिल बुरा नहीं करते
गर आज तुझ से जुदा हैं तो कल बहम होंगे
ये रात भर की जुदाई तो कोई बात नहीं
गर आज औज पे है ताला-ए-रक़ीब तो क्या
ये चार दिन की ख़ुदाई तो कोई बात नहीं
जो तुझ से अहद-ए-वफ़ा उस्तुवार रखते हैं
इलाज-ए-गर्दिश-ए-लैल-ओ-नहार रखते हैं ।
✒️चंद रोज़ और मिरी जान -5
चंद रोज़ और मिरी जान फ़क़त चंद ही रोज़
ज़ुल्म की छाँव में दम लेने पे मजबूर हैं हम
और कुछ देर सितम सह लें तड़प लें रो लें
अपने अज्दाद की मीरास है माज़ूर हैं हम
जिस्म पर क़ैद है जज़्बात पे ज़ंजीरें हैं
फ़िक्र महबूस है गुफ़्तार पे ताज़ीरें हैं
अपनी हिम्मत है कि हम फिर भी जिए जाते हैं
ज़िंदगी क्या किसी मुफ़लिस की क़बा है जिस में
हर घड़ी दर्द के पैवंद लगे जाते हैं
लेकिन अब ज़ुल्म की मीआद के दिन थोड़े हैं
इक ज़रा सब्र कि फ़रियाद के दिन थोड़े हैं
अरसा-ए-दहर की झुलसी हुई वीरानी में
हम को रहना है पे यूँही तो नहीं रहना है
अजनबी हाथों का बे-नाम गिराँ-बार सितम
आज सहना है हमेशा तो नहीं सहना है
ये तिरे हुस्न से लिपटी हुई आलाम की गर्द
अपनी दो रोज़ा जवानी की शिकस्तों का शुमार
चाँदनी रातों का बेकार दहकता हुआ दर्द
दिल की बे-सूद तड़प जिस्म की मायूस पुकार
चंद रोज़ और मिरी जान फ़क़त चंद ही रोज़ ।
✒️दश्त-ए-तन्हाई में ऐ जान-ए-जहाँ 6
दश्त-ए-तन्हाई में ऐ जान-ए-जहाँ लर्ज़ां हैं
तेरी आवाज़ के साए तिरे होंटों के सराब
दश्त-ए-तन्हाई में दूरी के ख़स ओ ख़ाक तले
खिल रहे हैं तिरे पहलू के समन और गुलाब
उठ रही है कहीं क़ुर्बत से तिरी साँस की आँच
अपनी ख़ुशबू में सुलगती हुई मद्धम मद्धम
दूर उफ़ुक़ पार चमकती हुई क़तरा क़तरा
गिर रही है तिरी दिलदार नज़र की शबनम
इस क़दर प्यार से ऐ जान-ए-जहाँ रक्खा है
दिल के रुख़्सार पे इस वक़्त तिरी याद ने हात
यूँ गुमाँ होता है गरचे है अभी सुब्ह-ए-फ़िराक़
ढल गया हिज्र का दिन आ भी गई वस्ल की रात ।
✒️हम परवरिश-ए-लौह-ओ-क़लम करते रहेंगे 7
हम परवरिश-ए-लौह-ओ-क़लम करते रहेंगे
जो दिल पे गुज़रती है रक़म करते रहेंगे
असबाब-ए-ग़म-ए-इश्क़ बहम करते रहेंगे
वीरानी-ए-दौराँ पे करम करते रहेंगे
हाँ तल्ख़ी-ए-अय्याम अभी और बढ़ेगी
हाँ अहल-ए-सितम मश्क़-ए-सितम करते रहेंगे
मंज़ूर ये तल्ख़ी ये सितम हम को गवारा
दम है तो मुदावा-ए-अलम करते रहेंगे
मय-ख़ाना सलामत है तो हम सुर्ख़ी-ए-मय से
तज़ईन-ए-दर-ओ-बाम-ए-हरम करते रहेंगे
बाक़ी है लहू दिल में तो हर अश्क से पैदा
रंग-ए-लब-ओ-रुख़्सार-ए-सनम करते रहेंगे
इक तर्ज़-ए-तग़ाफ़ुल है सो वो उन को मुबारक
इक अर्ज़-ए-तमन्ना है सो हम करते रहेंगे ।
✒️गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौ-बहार चले 8
गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौ-बहार चले
चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले
क़फ़स उदास है यारो सबा से कुछ तो कहो
कहीं तो बहर-ए-ख़ुदा आज ज़िक्र-ए-यार चले
कभी तो सुब्ह तिरे कुंज-ए-लब से हो आग़ाज़
कभी तो शब सर-ए-काकुल से मुश्क-बार चले
बड़ा है दर्द का रिश्ता ये दिल ग़रीब सही
तुम्हारे नाम पे आएँगे ग़म-गुसार चले
जो हम पे गुज़री सो गुज़री मगर शब-ए-हिज्राँ
हमारे अश्क तिरी आक़िबत सँवार चले
हुज़ूर-ए-यार हुई दफ़्तर-ए-जुनूँ की तलब
गिरह में ले के गरेबाँ का तार तार चले
मक़ाम 'फ़ैज़' कोई राह में जचा ही नहीं
जो कू-ए-यार से निकले तो सू-ए-दार चले ।
✒️फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की कुछ चुनिंदा नज़्में/ ग़ज़ल :
(उर्दू नज़्म/ग़ज़ल इन हिन्दी)
- दोनों जहान तेरी मोहब्बत मे हार के
- हर हक़ीक़त मजाज़ हो जाए
- इश्क़ मिन्नतकशे-क़रार नहीं
- राज़े-उल्फ़त छुपा के देख लिया
- अंजाम
- हसीना-ए-ख्याल से
- इंतज़ार
- कुत्ते
- कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया
- तन्हाई
- आज बाज़ार में पा-ब-जौलाँ चलो
- याद
- ये फ़स्ल उमीदों की हमदम
- इस वक़्त तो यूँ लगता है
- इंतिसाब
- फैज़ ने ये नज़्म 1974 में ढ़ाका से वापसी पर लिखी
- दुआ
- पास रहो
- हार्ट-अटैक
- हम तो मजबूर-ए-वफ़ा हैं
- बहार आई
- तराना
- जब तेरी समुंदर आँखों में
- तुम अपनी करनी कर गुज़रो
- रंग है दिल का मिरे
- ज़िंदाँ की एक शाम
- हिज्र की राख और विसाल के फूल
- जो मेरा तुम्हारा रिश्ता है
- मिरे दर्द को जो ज़बाँ मिले
- आज की रात
- गीत
- ग़म न कर, ग़म न कर
- सोचने दो
- क्या करें
- नज़्र-ए-मौलाना हसरत-मोहानी
- अंजाम
1. दोनों जहान तेरी मोहब्बत मे हार के
दोनों जहान तेरी मोहब्बत मे हार के
वो जा रहा है कोई शबे-ग़म गुज़ार के
वीराँ है मयकदः ख़ुमो-सागर उदास हैं
तुम क्या गये कि रूठ गए दिन बहार के
इक फ़ुर्सते-गुनाह मिली, वो भी चार दिन
देखें हैं हमने हौसले परवरदिगार के
दुनिया ने तेरी याद से बेगानः कर दिया
तुम से भी दिलफ़रेब हैं ग़म रोज़गार के
भूले से मुस्कुरा तो दिये थे वो आज ’फ़ैज़’
मत पूछ वलवले दिले-नाकर्दःकार के ।
(मयकदः=शराबघर, ख़ुमो-सागर=सुराही
और जाम, परवरदिगार=ख़ुदा, नाकर्दःकार=
अनुभवहीन)
2. हर हक़ीक़त मजाज़ हो जाए
हर हक़ीक़त मजाज़ हो जाए
काफ़िरों की नमाज़ हो जाए
दिल रहीने-नियाज़ हो जाए
बेकसी कारसाज़ हो जाए
मिन्नते-चाराःसाज़ कौन करे
दर्द जब जाँ-नवाज़ हो जाए
इश्क़ दिल में रहे तो रुस्वा हो
लब पे आए तो राज़ हो जाए
लुत्फ़ का इन्तज़ार करता हूँ
जौर ता-हद्दे-नाज़ हो जाए
उम्र बे-सूद कट रही है 'फ़ैज़'
काश अफ़शां-ए-राज़ हो जाए ।
(मजाज़=भ्रम, रहीने-नियाज़=
श्रद्धा से पूर्ण, रुस्वा=बदनाम, जौर=
अत्याचार, अफ़शां-ए-राज़=रहस्योदघाटन)
3. इश्क़ मिन्नतकशे-क़रार नहीं
इश्क़ मिन्नतकशे-क़रार नहीं
हुस्न मज़बूरे-इंतज़ार नहीं
तेरी रंजिश की इंतिहा मालूम
हसरतों का मिरी शुमार नहीं
अपनी नज़रें बिखेर दे साक़ी
मय बअंदाज़ः-ए-ख़ुमार नहीं
ज़ेरे-लब है अभी तबस्सुमे-दोस्त
मुन्तशिर जल्वः-ए-बहार नहीं
अपनी तकमील कर रहा हूँ मैं
वरनः तुझसे तो मुझको प्यार नहीं
चारः-ए-इंतज़ार कौन करे
तेरी नफ़रत भी उस्तवार नहीं
'फ़ैज़' ज़िंदा रहें वो हैं तो सही
क्या हुआ गर वफ़ाशेआ'र नहीं ।
(मिन्नतकशे-क़रार=चैन का इच्छुक,
बअंदाज़ः-ए-ख़ुमार=उतरा नशा पूरा
करने भर को, मुन्तशिर=बिखरा हुआ,
तकमील=पूर्ति, चारः-ए-इंतज़ार=प्रतीक्षा
का समधान, वफ़ाशेआ'र=वफ़ा करने वाला)
4. राज़े-उल्फ़त छुपा के देख लिया
राज़े-उल्फ़त छुपा के देख लिया
दिल बहुत कुछ जला के देख लिया
और क्या देखने को बाक़ी है
आप से दिल लगा के देख लिया
वो मिरे हो के भी मेरे न हुए
उनको अपना बना के देख लिया
आज उनकी नज़र में कुछ हमने
सबकी नज़रें बचा के देख लिया
'फ़ैज़' तक़्मील-ए-ग़म भी हो न सकी
इश्क़ को आज़मा के देख लिया
आस उस दर से टूटती ही नहीं
जा के देखा, न जा के देख लिया ।
(तक़्मील-ए-ग़म=दुख की पूर्ति)
5. अंजाम
हैं लबरेज़ आहों से ठंडी हवाएं
उदासी में डूबी हुयी हैं घटाएं
मुहब्बत की दुनिया में शाम आ चुकी है
सियहपोश हैं ज़िन्दगी की फ़ज़ाएं
मचलती हैं सीने में लाख आरज़ूएं
तड़पती हैं आंखों में लाख इलतिजाएं
तग़ाफ़ुल के आग़ोश में सो रहे हैं
तुमहारे सितम और मेरी वफ़ाएं
मगर फिर भी ऐ मेरे मासूम कातिल
तुमहें पयार करती हैं मेरी दुआएं ।
(लबरेज़=भरीं हुई, इलतिजा=
बेनती, तग़ाफ़ुल =अनदेखी करना)
6. हसीना-ए-ख्याल से
मुझे दे दो
रसीले होंठ, मासूमाना पेशानी, हसीं आंखें
कि मैं इक बार फिर रंगीनियों में ग़र्क हो जाऊं
मिरी हसती को तेरी इक नज़र आग़ोश में ले ले
हमेशा के लिए इस दाम में महफ़ूज़ हो जाऊं
ज़िया-ए-हुस्न से ज़ुल्मात-ए-दुनिया में न फिर आऊं
गुज़शता हसरतों के दाग़ मेरे दिल से धुल जायें
मैं आनेवाले ग़म की फ़िक्र से आज़ाद हो जाऊं
मिरे माज़ी-ओ-मुस्तकबिल सरासर महव हो जायें
मुझे वह इक नज़र, इक जाविदानी-सी नज़र दे दे ।
(दाम=जाल, ज़िया-ए-हुस्न=रूप की ज्योति,
माज़ी-ओ-मुस्तकबिल=भूत-भविष्य, जाविदानी=
अमर)
7. इंतज़ार
गुज़र रहे हैं सबो-रोज़ तुम नहीं आतीं
रियाज़े-ज़ीसत है आज़ुरदा-ए-बहार अभी
मिरे ख्याल की दुनिया है सोगवार अभी
जो हसरतें तिरे ग़म की कफ़ील हैं, प्यारी
अभी तलक मिरी तन्हाईयों में बसती हैं
तवील रातें अभी तक तवील हैं, प्यारी
उदास आंखें तिरी दीद को तरसती हैं
बहारे-हुस्न पे पाबन्दी-ए-जफ़ा कब तक
ये आज़मायशे-सबरे-गुरेज़पा कब तक
कसम तुम्हारी, बहुत ग़म उठा चुका हूं मैं
ग़लत था दाव-ए-सबरो-शकेब आ जाओ
करारे-ख़ातिरे-बेताब थक गया हूं मैं ।
(रियाज़े-ज़ीसत=ज़िंदगी का अभ्यास,
आज़ुरदा=सताया हुआ, कफ़ील=बंद,
आज़मायशे-सबरे-गुरेज़पा=बार बार
टूटने वाले सबर का इम्तिहान, सबरो-
शकेब=धीरज, करारे-ख़ातिरे-बेताब=
बेचैन दिल की शान्ति)
8. कुत्ते
ये गलियों के आवारा बेकार कुत्ते
कि बख़शा गया जिनको ज़ौके-गदाई
ज़माने की फिटकार सरमाया इनका
जहां-भर की धुतकार इनकी कमाई
न आराम शब को, न राहत सवेरे
ग़लाज़त में घर, नालियों में बसेरे
जो बिगड़ें तो इक दूसरे से लड़ा दो
ज़रा एक रोटी का टुकड़ा दिखा दो
ये हर एक की ठोकरें खाने वाले
ये फ़ाकों से उकता के मर जाने वाले
ये मज़लूम मख़लूक गर सर उठायें
तो इंसान सब सरकशी भूल जायें
ये चाहें तो दुनिया को अपना बना लें
ये आकायों की हड्डियां तक चबा लें
कोई इनको एहसासे-ज़िल्लत दिला दे
कोई इनकी सोयी हुयी दुम हिला दे ।
(ज़ौके-गदाई=भिक्षा मांगने की रुचि,
सरमाया=पूँजी, ग़लाज़त=गन्दगी,
मख़लूक=प्राणी, सरकशी=अहंकार,
आकायों=मालिकों की, ज़िल्लत=
अपमान)
9. कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया
कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया
वो लोग बहुत ख़ुश-क़िस्मत थे
जो इश्क़ को काम समझते थे
या काम से आशिक़ी करते थे
हम जीते-जी मसरूफ़ रहे
कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया
काम इश्क़ के आड़े आता रहा
और इश्क़ से काम उलझता रहा
फिर आख़िर तंग आ कर हम ने
दोनों को अधूरा छोड़ दिया ।
10.तन्हाई
फिर कोई आया दिल-ए-ज़ार नहीं कोई नहीं
राह-रौ होगा कहीं और चला जाएगा
ढल चुकी रात बिखरने लगा तारों का ग़ुबार
लड़खड़ाने लगे ऐवानों में ख़्वाबीदा चराग़
सो गई रास्ता तक तक के हर इक राहगुज़ार
अजनबी ख़ाक ने धुँदला दिए क़दमों के सुराग़
गुल करो शमएँ बढ़ा दो मय ओ मीना ओ अयाग़
अपने बे-ख़्वाब किवाड़ों को मुक़फ़्फ़ल कर लो
अब यहाँ कोई नहीं कोई नहीं ।
11. आज बाज़ार में पा-ब-जौलाँ चलो
(जब फ़ैज़ को लाहौर जेल से एक डेंटिस्ट के पास ज़ंजीरों में बाँध कर ले जा रहे थे, रास्ते में लोग उन्हें पहचान गए और उन के ताँगे के पीछे हो लिए, उसी मंज़र को बयान करते हुए फ़ैज़ ने ये नज़्म कही)
चश्म-ए-नम जान-ए-शोरीदा काफ़ी नहीं
तोहमत-ए-इश्क़-ए-पोशीदा काफ़ी नहीं
आज बाज़ार में पा-ब-जौलाँ चलो
दस्त-अफ़्शाँ चलो मस्त ओ रक़्साँ चलो
ख़ाक-बर-सर चलो ख़ूँ-ब-दामाँ चलो
राह तकता है सब शहर-ए-जानाँ चलो
हाकिम-ए-शहर भी मजमा-ए-आम भी
तीर-ए-इल्ज़ाम भी संग-ए-दुश्नाम भी
सुब्ह-ए-नाशाद भी रोज़-ए-नाकाम भी
उन का दम-साज़ अपने सिवा कौन है
शहर-ए-जानाँ में अब बा-सफ़ा कौन है
दस्त-ए-क़ातिल के शायाँ रहा कौन है
रख़्त-ए-दिल बाँध लो दिल-फ़िगारो चलो
फिर हमीं क़त्ल हो आएँ यारो चलो ।
12. याद
दश्त-ए-तन्हाई में ऐ जान-ए-जहाँ लर्ज़ां हैं
तेरी आवाज़ के साए तिरे होंटों के सराब
दश्त-ए-तन्हाई में दूरी के ख़स ओ ख़ाक तले
खिल रहे हैं तिरे पहलू के समन और गुलाब
उठ रही है कहीं क़ुर्बत से तिरी साँस की आँच
अपनी ख़ुशबू में सुलगती हुई मद्धम मद्धम
दूर उफ़ुक़ पार चमकती हुई क़तरा क़तरा
गिर रही है तिरी दिलदार नज़र की शबनम
इस क़दर प्यार से ऐ जान-ए-जहाँ रक्खा है
दिल के रुख़्सार पे इस वक़्त तिरी याद ने हात
यूँ गुमाँ होता है गरचे है अभी सुब्ह-ए-फ़िराक़
ढल गया हिज्र का दिन आ भी गई वस्ल की रात ।
13. ये फ़स्ल उमीदों की हमदम
सब काट दो
बिस्मिल पौदों को
बे-आब सिसकते मत छोड़ो
सब नोच लो
बेकल फूलों को
शाख़ों पे बिलकते मत छोड़ो
ये फ़स्ल उमीदों की हमदम
इस बार भी ग़ारत जाएगी
सब मेहनत सुब्हों शामों की
अब के भी अकारत जाएगी
खेती के कोनों-खुदरों में
फिर अपने लहू की खाद भरो
फिर मिट्टी सींचो अश्कों से
फिर अगली रुत की फ़िक्र करो
फिर अगली रुत की फ़िक्र करो
जब फिर इक बार उजड़ना है
इक फ़स्ल पकी तो भरपाया
जब तक तो यही कुछ करना ।
14. इस वक़्त तो यूँ लगता है
इस वक़्त तो यूँ लगता है अब कुछ भी नहीं है
महताब न सूरज, न अँधेरा न सवेरा
आँखों के दरीचों पे किसी हुस्न की चिलमन
और दिल की पनाहों में किसी दर्द का डेरा
मुमकिन है कोई वहम था, मुमकिन है सुना हो
गलियों में किसी चाप का इक आख़िरी फेरा
शाख़ों में ख़यालों के घने पेड़ की शायद
अब आ के करेगा न कोई ख़्वाब बसेरा
इक बैर न इक मेहर न इक रब्त न रिश्ता
तेरा कोई अपना, न पराया कोई मेरा
माना कि ये सुनसान घड़ी सख़्त कड़ी है
लेकिन मिरे दिल ये तो फ़क़त इक ही घड़ी है
हिम्मत करो जीने को तो इक उम्र पड़ी है ।
15. इंतिसाब
आज के नाम
और
आज के ग़म के नाम
आज का ग़म कि है ज़िंदगी के भरे गुलसिताँ से ख़फ़ा
ज़र्द पत्तों का बन
ज़र्द पत्तों का बन जो मिरा देस है
दर्द की अंजुमन जो मिरा देस है
क्लरकों की अफ़्सुर्दा जानों के नाम
किर्म-ख़ुर्दा दिलों और ज़बानों के नाम
पोस्ट-मैनों के नाम
ताँगे वालों का नाम
रेल-बानों के नाम
कार-ख़ानों के भूके जियालों के नाम
बादशाह-ए-जहाँ वाली-ए-मा-सिवा, नाएब-उल-अल्लाह फ़िल-अर्ज़
दहक़ाँ के नाम
जिस के ढोरों को ज़ालिम हँका ले गए
जिस की बेटी को डाकू उठा ले गए
हाथ भर खेत से एक अंगुश्त पटवार ने काट ली है
दूसरी मालिये के बहाने से सरकार ने काट ली है
जिस की पग ज़ोर वालों के पाँव-तले
धज्जियाँ हो गई है
उन दुखी माओं के नाम
रात में जिन के बच्चे बिलकते हैं और
नींद की मार खाए हुए बाज़ुओं में सँभलते नहीं
दुख बताते नहीं
मिन्नतों ज़ारियों से बहलते नहीं
उन हसीनाओं के नाम
जिन की आँखों के गुल
चिलमनों और दरीचों की बेलों पे बे-कार खिल खिल के
मुरझा गए हैं
उन बियाहताओं के नाम
जिन के बदन
बे मोहब्बत रिया-कार सेजों पे सज सज के उक्ता गए हैं
बेवाओं के नाम
कटड़ियों और गलियों मोहल्लों के नाम
जिन की नापाक ख़ाशाक से चाँद रातों
को आ आ के करता है अक्सर वज़ू
जिन के सायों में करती है आह-ओ-बुका
आँचलों की हिना
चूड़ियों की खनक
काकुलों की महक
आरज़ू-मंद सीनों की अपने पसीने में जुल्ने की बू
पढ़ने वालों के नाम
वो जो असहाब-ए-तब्ल-ओ-अलम
के दरों पर किताब और क़लम
का तक़ाज़ा लिए हाथ फैलाए
वो मासूम जो भोले-पन में
वहाँ अपने नन्हे चराग़ों में लौ की लगन
ले के पहुँचे जहाँ
बट रहे थे घटा-टोप बे-अंत रातों के साए
उन असीरों के नाम
जिन के सीनों में फ़र्दा के शब-ताब गौहर
जेल-ख़ानों की शोरीदा रातों की सरसर में
जल जल के अंजुम-नुमा होगए हैं
आने वाले दिनों के सफ़ीरों के नाम
वो जो ख़ुश्बू-ए-गुल की तरह
अपने पैग़ाम पर ख़ुद फ़िदा होगए हैं ।
16. ढाका से वापसी पर
(फैज़ ने ये नज़्म 1974 में ढ़ाका से वापसी पर लिखी)
हम कि ठहरे अजनबी इतनी मुदारातों के बा'द
फिर बनेंगे आश्ना कितनी मुलाक़ातों के बा'द
कब नज़र में आएगी बे-दाग़ सब्ज़े की बहार
ख़ून के धब्बे धुलेंगे कितनी बरसातों के बा'द
थे बहुत बेदर्द लम्हे ख़त्म-ए-दर्द-ए-इश्क़ के
थीं बहुत बे-मेहर सुब्हें मेहरबाँ रातों के बा'द
दिल तो चाहा पर शिकस्त-ए-दिल ने मोहलत ही न दी
कुछ गिले शिकवे भी कर लेते मुनाजातों के बा'द
उन से जो कहने गए थे 'फ़ैज़' जाँ सदक़े किए
अन-कही ही रह गई वो बात सब बातों के बा'द ।
17. दुआ
आइए हाथ उठाएँ हम भी
हम जिन्हें रस्म-ए-दुआ याद नहीं
हम जिन्हें सोज़-ए-मोहब्बत के सिवा
कोई बुत कोई ख़ुदा याद नहीं
आइए अर्ज़ गुज़ारें कि निगार-ए-हस्ती
ज़हर-ए-इमरोज़ में शीरीनी-ए-फ़र्दा भर दे
वो जिन्हें ताब-ए-गिराँ-बारी-ए-अय्याम नहीं
उन की पलकों पे शब ओ रोज़ को हल्का कर दे
जिन की आँखों को रुख़-ए-सुब्ह का यारा भी नहीं
उन की रातों में कोई शम्अ मुनव्वर कर दे
जिन के क़दमों को किसी रह का सहारा भी नहीं
उन की नज़रों पे कोई राह उजागर कर दे
जिन का दीं पैरवी-ए-किज़्ब-ओ-रिया है उन को
हिम्मत-ए-कुफ़्र मिले जुरअत-ए-तहक़ीक़ मिले
जिन के सर मुंतज़िर-ए-तेग़-ए-जफ़ा हैं उन को
दस्त-ए-क़ातिल को झटक देने की तौफ़ीक़ मिले
इश्क़ का सिर्र-ए-निहाँ जान-ए-तपाँ है जिस से
आज इक़रार करें और तपिश मिट जाए
हर्फ़-ए-हक़ दिल में खटकता है जो काँटे की तरह
आज इज़हार करें और ख़लिश मिट जाए ।
18. पास रहो
तुम मिरे पास रहो
मिरे क़ातिल, मिरे दिलदार मिरे पास रहो
जिस घड़ी रात चले,
आसमानों का लहू पी के सियह रात चले
मरहम-ए-मुश्क लिए, नश्तर-ए-अल्मास लिए
बैन करती हुई हँसती हुई, गाती निकले
दर्द के कासनी पाज़ेब बजाती निकले
जिस घड़ी सीनों में डूबे हुए दिल
आस्तीनों में निहाँ हाथों की रह तकने लगे
आस लिए
और बच्चों के बिलकने की तरह क़ुलक़ुल-ए-मय
बहर-ए-ना-सूदगी मचले तो मनाए न मने
जब कोई बात बनाए न बने
जब न कोई बात चले
जिस घड़ी रात चले
जिस घड़ी मातमी सुनसान सियह रात चले
पास रहो
मिरे क़ातिल, मिरे दिलदार मिरे पास रहो ।
19. हार्ट-अटैक
दर्द इतना था कि उस रात दिल-ए-वहशी ने
हर रग-ए-जाँ से उलझना चाहा
हर बुन-ए-मू से टपकना चाहा
और कहीं दूर तिरे सहन में गोया
पत्ता पत्ता मिरे अफ़्सुर्दा लहू में धुल कर
हुस्न-ए-महताब से आज़ुर्दा नज़र आने लगा
मेरे वीराना-ए-तन में गोया
सारे दुखते हुए रेशों की तनाबें खुल कर
सिलसिला-वार पता देने लगीं
रुख़्सत-ए-क़ाफ़िला-ए-शौक़ की तय्यारी का
और जब याद की बुझती हुई शम्ओं में नज़र आया कहीं
एक पल आख़िरी लम्हा तिरी दिलदारी का
दर्द इतना था कि उस से भी गुज़रना चाहा
हम ने चाहा भी मगर दिल न ठहरना चाहा ।
20. हम तो मजबूर-ए-वफ़ा हैं
तुझ को कितनों का लहू चाहिए ऐ अर्ज़-ए-वतन
जो तिरे आरिज़-ए-बे-रंग को गुलनार करें
कितनी आहों से कलेजा तिरा ठंडा होगा
कितने आँसू तिरे सहराओं को गुलज़ार करें
तेरे ऐवानों में पुर्ज़े हुए पैमाँ कितने
कितने वादे जो न आसूदा-ए-इक़रार हुए
कितनी आँखों को नज़र खा गई बद-ख़्वाहों की
ख़्वाब कितने तिरी शह-राहों में संगसार हुए
''बला-कशान-ए-मोहब्बत पे जो हुआ सो हुआ
जो मुझ पे गुज़री मत उस से कहो, हुआ सो हुआ
मबादा हो कोई ज़ालिम तिरा गरेबाँ-गीर
लहू के दाग़ तू दामन से धो, हुआ सो हुआ''
हम तो मजबूर-ए-वफ़ा हैं मगर ऐ जान-ए-जहाँ
अपने उश्शाक़ से ऐसे भी कोई करता है
तेरी महफ़िल को ख़ुदा रक्खे अबद तक क़ाएम
हम तो मेहमाँ हैं घड़ी भर के हमारा क्या है ।
21. बहार आई
बहार आई तो जैसे यक-बार
लौट आए हैं फिर अदम से
वो ख़्वाब सारे शबाब सारे
जो तेरे होंटों पे मर-मिटे थे
जो मिट के हर बार फिर जिए थे
निखर गए हैं गुलाब सारे
जो तेरी यादों से मुश्कबू हैं
जो तेरे उश्शाक़ का लहू हैं
उबल पड़े हैं अज़ाब सारे
मलाल-ए-अहवाल-ए-दोस्ताँ भी
ख़ुमार-ए-आग़ोश-ए-मह-वशां भी
ग़ुबार-ए-ख़ातिर के बाब सारे
तिरे हमारे
सवाल सारे जवाब सारे
बहार आई तो खुल गए हैं
नए सिरे से हिसाब सारे ।
22. तराना
दरबार-ए-वतन में जब इक दिन सब जाने वाले जाएँगे
कुछ अपनी सज़ा को पहुँचेंगे, कुछ अपनी जज़ा ले जाएँगे
ऐ ख़ाक-नशीनो उठ बैठो वो वक़्त क़रीब आ पहुँचा है
जब तख़्त गिराए जाएँगे जब ताज उछाले जाएँगे
अब टूट गिरेंगी ज़ंजीरें अब ज़िंदानों की ख़ैर नहीं
जो दरिया झूम के उट्ठे हैं तिनकों से न टाले जाएँगे
कटते भी चलो, बढ़ते भी चलो, बाज़ू भी बहुत हैं सर भी बहुत
चलते भी चलो कि अब डेरे मंज़िल ही पे डाले जाएँगे
ऐ ज़ुल्म के मातो लब खोलो चुप रहने वालो चुप कब तक
कुछ हश्र तो उन से उट्ठेगा कुछ दूर तो नाले जाएँगे ।
23. जब तेरी समुंदर आँखों में
ये धूप किनारा शाम ढले
मिलते हैं दोनों वक़्त जहाँ
जो रात न दिन जो आज न कल
पल-भर को अमर पल भर में धुआँ
इस धूप किनारे पल-दो-पल
होंटों की लपक
बाँहों की छनक
ये मेल हमारा झूट न सच
क्यूँ रार करो क्यूँ दोश धरो
किस कारन झूटी बात करो
जब तेरी समुंदर आँखों में
इस शाम का सूरज डूबेगा
सुख सोएँगे घर दर वाले
और राही अपनी रह लेगा ।
24. तुम अपनी करनी कर गुज़रो
अब क्यूँ उस दिन का ज़िक्र करो
जब दिल टुकड़े हो जाएगा
और सारे ग़म मिट जाएँगे
जो कुछ पाया खो जाएगा
जो मिल न सका वो पाएँगे
ये दिन तो वही पहला दिन है
जो पहला दिन था चाहत का
हम जिस की तमन्ना करते रहे
और जिस से हर दम डरते रहे
ये दिन तो कई बार आया
सौ बार बसे और उजड़ गए
सौ बार लुटे और भर पाया
अब क्यूँ उस दिन का ज़िक्र करो
जब दिल टुकड़े हो जाएगा
और सारे ग़म मिट जाएँगे
तुम ख़ौफ़-ओ-ख़तर से दर-गुज़रो
जो होना है सो होना है
गर हँसना है तो हँसना है
गर रोना है तो रोना है
तुम अपनी करनी कर गुज़रो
जो होगा देखा जाएगा ।
25. रंग है दिल का मिरे
तुम न आए थे तो हर इक चीज़ वही थी कि जो है
आसमाँ हद्द-ए-नज़र राहगुज़र राहगुज़र शीशा-ए-मय शीशा-ए-मय
और अब शीशा-ए-मय राहगुज़र रंग-ए-फ़लक
रंग है दिल का मिरे ख़ून-ए-जिगर होने तक
चम्पई रंग कभी राहत-ए-दीदार का रंग
सुरमई रंग कि है साअत-ए-बेज़ार का रंग
ज़र्द पत्तों का ख़स-ओ-ख़ार का रंग
सुर्ख़ फूलों का दहकते हुए गुलज़ार का रंग
ज़हर का रंग लहू रंग शब-ए-तार का रंग
आसमाँ राहगुज़र शीशा ए-मय
कोई भीगा हुआ दामन कोई दुखती हुई रग
कोई हर लहज़ा बदलता हुआ आईना है
अब जो आए हो तो ठहरो कि कोई रंग कोई रुत कोई शय
एक जगह पर ठहरे
फिर से इक बार हर इक चीज़ वही हो कि जो है
आसमाँ हद्द-ए-नज़र राहगुज़र राहगुज़र शीशा-ए-मय शीशा-ए मय ।
26. ज़िंदाँ की एक शाम
शाम के पेच-ओ-ख़म सितारों से
ज़ीना ज़ीना उतर रही है रात
यूँ सबा पास से गुज़रती है
जैसे कह दी किसी ने प्यार की बात
सेहन-ए-ज़िंदाँ के बे-वतन अश्जार
सर-निगूँ महव हैं बनाने में
दामन-ए-आसमाँ पे नक़्श-ओ-निगार
शाना-ए-बाम पर दमकता है
मेहरबाँ चाँदनी का दस्त-ए-जमील
ख़ाक में घुल गई है आब-ए-नुजूम
नूर में घुल गया है अर्श का नील
सब्ज़ गोशों में नील-गूँ साए
लहलहाते हैं जिस तरह दिल में
मौज-ए-दर्द-ए-फ़िराक़-ए-यार आए
दिल से पैहम ख़याल कहता है
इतनी शीरीं है ज़िंदगी इस पल
ज़ुल्म का ज़हर घोलने वाले
कामराँ हो सकेंगे आज न कल
जल्वा-गाह-ए-विसाल की शमएँ
वो बुझा भी चुके अगर तो क्या
चाँद को गुल करें तो हम जानें ।
27. हिज्र की राख और विसाल के फूल
आज फिर दर्द-ओ-ग़म के धागे में
हम पिरो कर तिरे ख़याल के फूल
तर्क-ए-उल्फ़त के दश्त से चुन कर
आश्नाई के माह ओ साल के फूल
तेरी दहलीज़ पर सजा आए
फिर तिरी याद पर चढ़ा आए
बाँध कर आरज़ू के पल्ले में
हिज्र की राख और विसाल के फूल ।
28. जो मेरा तुम्हारा रिश्ता है
मैं क्या लिखूँ कि जो मेरा तुम्हारा रिश्ता है
वो आशिक़ी की ज़बाँ में कहीं भी दर्ज नहीं
लिखा गया है बहुत लुतफ़-ए-वस्ल ओ दर्द-ए-फ़िराक़
मगर ये कैफ़ियत अपनी रक़म नहीं है कहीं
ये अपना इशक़-ए-हम-आग़ोश जिस में हिज्र ओ विसाल
ये अपना दर्द कि है कब से हमदम-ए-मह-ओ-साल
इस इश्क़-ए-ख़ास को हर एक से छुपाए हुए
''गुज़र गया है ज़माना गले लगाए हुए'' ।
29. मिरे दर्द को जो ज़बाँ मिले
मिरा दर्द नग़मा-ए-बे-सदा
मिरी ज़ात ज़र्रा-ए-बे-निशाँ
मेरे दर्द को जो ज़बाँ मिले
मुझे अपना नाम-ओ-निशाँ मिले
मेरी ज़ात का जो निशाँ मिले
मुझे राज़-ए-नज़्म-ए-जहाँ मिले
जो मुझे ये राज़-ए-निहाँ मिले
मिरी ख़ामुशी को बयाँ मिले
मुझे काएनात की सरवरी
मुझे दौलत-ए-दो-जहाँ मिले ।
30. आज की रात
आज की रात साज़-ए-दर्द न छेड़
दुख से भरपूर दिन तमाम हुए
और कल की ख़बर किसे मालूम
दोश-ओ-फ़र्दा की मिट चुकी हैं हुदूद
हो न हो अब सहर किसे मालूम
ज़िंदगी हेच! लेकिन आज की रात
एज़दिय्यत है मुमकिन आज की रात
आज की रात साज़-ए-दर्द न छेड़
अब न दोहरा फ़साना-हा-ए-अलम
अपनी क़िस्मत पे सोगवार न हो
फ़िक्र-ए-फ़र्दा उतार दे दिल से
उम्र-ए-रफ़्ता पे अश्क-बार न हो
अहद-ए-ग़म की हिकायतें मत पूछ
हो चुकीं सब शिकायतें मत पूछ
आज की रात साज़-ए-दर्द न छेड़ ।
31. गीत
चलो फिर से मुस्कुराएँचलो फिर से दिल जलाएँ
जो गुज़र गईं हैं रातें
उन्हें फिर जगा के लाएँ
जो बिसर गईं हैं बातें
उन्हें याद में बुलाएँ
चलो फिर से दिल लगाएँ
चलो फिर से मुस्कुराएँ
किसी शह-नशीं पे झलकी
वो धनक किसी क़बा की
किसी रग में कसमसाई
वो कसक किसी अदा की
कोई हर्फ़-ए-बे-मुरव्वत
किसी कुंज-ए-लब से फूटा
वो छनक के शीशा-ए-दिल
तह-ए-बाम फिर से टूटा
ये मिलन की ना मिलन की
ये लगन की और जलन की
जो सही हैं वारदातें
जो गुज़र गईं हैं रातें
जो बिसर गई हैं बातें
कोई उन की धुन बनाएँ
कोई उन का गीत गाएँ
चलो फिर से मुस्कुराएँ
चलो फिर से दिल जलाएँ ।
यार लौट आएँगे, दिल ठहर जाएगा, ग़म न कर, ग़म न कर
ज़ख़्म भर जाएगा
ग़म न कर, ग़म न कर
दिन निकल आएगा
ग़म न कर, ग़म न कर
अब्र खुल जाएगा, रात ढल जाएगी
ग़म न कर, ग़म न कर
रुत बदल जाएगी
ग़म न कर, ग़म न कर ।
इस ख़याबाँ में
जो इस लहज़ा बयाबाँ भी नहीं
कौन सी शाख़ में फूल आए थे सब से पहले
कौन बे-रंग हुई रंज-ओ-तअब से पहले
और अब से पहले
किस घड़ी कौन से मौसम में यहाँ
ख़ून का क़हत पड़ा
गुल की शह-रग पे कड़ा
वक़्त पड़ा
सोचने दो
सोचने दो
इक ज़रा सोचने दो
ये भरा शहर जो अब वादी-ए-वीराँ भी नहीं
इस में किस वक़्त कहाँ
आग लगी थी पहले
इस के सफ़-बस्ता दरीचों में से किस में अव्वल
ज़ह हुई सुर्ख़ शुआओं की कमाँ
किस जगह जोत जगी थी पहले
सोचने दो
हम से उस देस का तुम नाम ओ निशाँ पूछते हो
जिस की तारीख़ न जुग़राफ़िया अब याद आए
और याद आए तो महबू-ए-गुज़िश्ता याद आए
रू-ब-रू आने से जी घबराए
हाँ मगर जैसे कोई
ऐसे महबूब या महबूबा का दिल रखने को
आ निकलता है कभी रात बिताने के लिए
हम अब उस उम्र को आ पहुँचे हैं जब हम भी यूँही
दिल से मिल आते हैं बस रस्म निभाने के लिए
दिल की क्या पूछते हो
सोचने दो ।



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