Saturday, April 11, 2026

बहुत आसान है पहचान उसकी


 
बहुत आसान है पहचान उसकी 
अगर दुखता नहीं तो दिल नहीं है ।

जावेद अख्तर की यह प्रसिद्ध शायरी इंसानियत और भावनाओं की परख को दर्शाती है। इसका अर्थ है कि यदि किसी के भीतर दर्द, सहानुभूति या प्रेम महसूस नहीं होता, तो वह इंसान दिल (हृदय) से खाली है। भावुक होना ही सच्चे इंसान या सच्चे दिल की सबसे बड़ी पहचान है। 

शायरी का अर्थ विस्तार से:

सच्ची भावना: यह पंक्ति बताती है कि दिल का काम सिर्फ धड़कना नहीं, बल्कि महसूस करना है। अगर कोई व्यक्ति दूसरों का दुख देखकर या किसी की कमी से दुखी नहीं होता, तो वह दिल बेजान या पत्थर जैसा है।

इंसानियत की परख: यह कविता उन लोगों पर तंज है जो संवेदनाहीन हो चुके हैं। सच्चा इंसान वही है जिसका दिल भावनाओं की गहराई में दुखे।

संदर्भ: यह पंक्तियाँ जावेद अख्तर द्वारा रचित गज़ल से ली गई हैं। 

संक्षेप में, "दर्द का एहसास ही दिल के होने का सबूत है"। 

हमारा जीवन




हमारा जीवन हमारे बच्चों के लिए या तो चेतावनी बन सकता है या मिसाल ।

इस पंक्ति का अर्थ है कि माता-पिता का आचरण बच्चों के लिए सबसे बड़ा सबक है। यदि माता-पिता सही काम करते हैं, तो वे मिसाल (आदर्श) बनते हैं; यदि गलत, तो चेतावनी (सीख) बन जाते हैं। बच्चे शब्दों से कम और आचरण से अधिक सीखते हैं, इसलिए हमारा जीवन ही उन्हें राह दिखाता है।

उपयोग के उदाहरण:

मिसाल : यदि आप ईमानदारी और कड़ी मेहनत करते हैं, तो बच्चे इसे अपनाते हैं।

चेतावनी : यदि आप झूठ बोलते हैं, तो बच्चे भी वही सीखते हैं, जिससे उनके भविष्य में गलत राह पर जाने का खतरा होता है। 

अर्थ और व्याख्या:

मिसाल बनना: जब माता-पिता अपने बच्चों के सामने खुद को सही आचरण, धैर्य और सफलता के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करते हैं, तो बच्चे उनसे प्रेरणा लेकर वैसे ही बनते हैं।

चेतावनी बनना: यदि माता-पिता के गलत फैसले, नशे की आदत या दुर्व्यवहार के कारण बच्चे जीवन में परेशानियां झेलते हैं, तो माता-पिता का जीवन बच्चों के लिए एक नकारात्मक मिसाल या चेतावनी बन जाता है। 

सरफिरे लोग हमें दुश्मन-ए-जां कहते हैं


 

सरफिरे लोग हमें दुश्मन-ए-जां कहते हैं
हम जो इस मुल्क की मिट्टी को भी माँ कहते हैं ।

यह शेर मुनव्वर राना की एक बहुत ही लोकप्रिय रचना है, जो देशप्रेम और वतन के प्रति उनकी निष्ठा को दर्शाती है।


उसी को जीने का हक है जो इस ज़माने में


 

उसी को जीने का हक है जो इस ज़माने में 
इधर का लगता रहे और उधर का हो जाए 

वसीम बरेलवी का यह शेर आज के दौर की चालाकी, अवसरवादिता और गिरगिट जैसी फितरत पर तीखा व्यंग्य करता है। इसका अर्थ है कि ज़माने में वही इंसान सुखी और सफल है जो दोगलापन (hypocrisy) अपनाता है, दोनों तरफ़ रिश्ते निभाता है और फायदा देखकर पाला बदल लेता है।

शायरी का अर्थ और विस्तार:

मूल अर्थ: आज के दौर में जीने का हक़ केवल उसी को है जो वफादार होने का नाटक करे ("इधर का लगता रहे") लेकिन मौका पड़ने पर खुद को सुरक्षित रखने के लिए दूसरे पाले में चला जाए ("और उधर का हो जाए")।

भावार्थ: कवि का कहना है कि आज सच्चाई और वफादारी की कोई कद्र नहीं है। जो लोग सीधे या एकनिष्ठ होते हैं, वे पीस दिए जाते हैं। जो लोग चालाक हैं, जो एक जगह से फायदा लेकर दूसरी जगह शामिल हो सकते हैं, वही इस कलयुगी ज़माने में फलते-फूलते हैं।

व्यंग्य: यह शेर राजनीति, रिश्तों और कामकाजी जीवन में व्याप्त स्वार्थ को दर्शाता है, जहाँ इंसान अपने फायदे के लिए अपनी निष्ठा बदलता रहता है। 

संक्षेप में, यह शेर यह बताता है कि आज के ज़माने में 'ईमानदार' होने से बेहतर 'समझदार' (स्वार्थी) होना माना जाता है, क्योंकि वही जीवन जीने के योग्य माना जाता है। 

दिल को तिरी चाहत पे भरोसा भी बहुत है


 

दिल को तिरी चाहत पे भरोसा भी बहुत है, 
और तुझ से बिछड़ जाने का डर भी नहीं जाता ।

अहमद फ़राज़ द्वारा रचित यह शेर, "दिल को तिरी चाहत पे भरोसा भी बहुत है, और तुझ से बिछड़ जाने का डर भी नहीं जाता", प्रेम में विश्वास और असुरक्षा के द्वंद्व को दर्शाता है। यह एक साथ गहरे प्यार और खोने के डर (प्यार के साथ अनिश्चितता) की भावना को व्यक्त करता है। 

शायरी का विस्तृत अर्थ:

"दिल को तिरी चाहत पे भरोसा भी बहुत है": प्रेमी को अपने साथी के प्यार और सच्चाई पर पूरा विश्वास है। उसे यकीन है कि साथी उससे सच्चा प्यार करता है।

"और तुझ से बिछड़ जाने का डर भी नहीं जाता": इस भरोसे के बावजूद, दिल में यह डर बना रहता है कि कहीं यह रिश्ता टूट न जाए। यह प्रेम की गहराई के साथ-साथ खोने की अनिश्चितता और असुरक्षा को भी दर्शाता है। 

निष्कर्ष:

यह शेर यह कहता है कि जब आप किसी से बहुत प्यार करते हैं, तो उन पर अटूट विश्वास होने के बावजूद, उन्हें खोने का डर मन से कभी नहीं जाता। यह प्यार की एक बहुत ही भावनात्मक स्थिति का वर्णन है। 


रहिये अब ऐसी जगह, चल कर जहाँ कोई न हो


 

रहिये अब ऐसी जगह, चल कर जहाँ कोई न हो
हम-सुख़न कोई न हो, और हम-ज़बाँ कोई न हो

यह प्रसिद्ध शेर मिर्ज़ा ग़ालिब की मशहूर गज़ल का हिस्सा है, जो भीड़भाड़ और सामाजिक बंधनों से दूर एकांत (सुकून) की तलाश को दर्शाता है। इस शेर में शायर एक ऐसी जगह बसने की बात कर रहा है जहाँ न तो कोई बात करने वाला हो और न ही कोई हमदर्द। 

अर्थ:

हम-सुख़न: बात करने वाला/साथी
हम-ज़बाँ: अपनी भाषा जानने वाला
बे-दर-ओ-दीवार: बिना दरवाज़े और दीवार का (खुली जगह)
हम-साया: पड़ोसी
पासबाँ: रखवाला/हिफाज़त करने वाला
तीमारदार: बीमार की सेवा करने वाला
नौहा-ख़्वाँ: मातम करने वाला/रोना-धोना करने वाला 

इज़्ज़तें, शोहरतें, चाहतें, उल्फ़तें...


 

"इज़्ज़तें, शोहरतें, चाहतें, उल्फ़तें...
कोई भी चीज़ दुनिया में रहती नहीं।
आज मैं हूँ जहाँ, कल कोई और था...
ये भी एक दौर है, वो भी एक दौर था।" 

यह पंक्तियां बॉलीवुड के पहले सुपरस्टार राजेश खन्ना की फिल्म 'दाग' (1973) का एक बहुत ही प्रसिद्ध और यादगार संवाद (dialogue) हैं, जो जीवन की क्षणभंगुरता (transience) को दर्शाती हैं। 

अर्थ:
यह संवाद बताता है कि सम्मान (इज्जत), प्रसिद्धि (शोहरत), प्यार (चाहत), और प्रेम-भावनाएं (उल्फत) दुनिया में हमेशा के लिए नहीं रहतीं। आज जिस स्थान पर आप हैं, कल वहां कोई और था, और कल कोई और होगा। समय और दौर बदलते रहते हैं। 


इज़्ज़तें : सम्मान / Respect
शोहरतें : प्रसिद्धि / Fame
चाहतें : प्यार / Affection
उल्फ़तें : प्रेम / Love 

Wednesday, April 8, 2026

ਮਿੱਟੀ



ਮੈਂ ਮਿੱਟੀ
ਮੇਰੀ ਜਾਤ ਮਿੱਟੀ
ਮੇਰਾ ਵਜੂਦ
ਮੇਰੀ ਔਕਾਤ ਮਿੱਟੀ
ਮੇਰਾ ਸਭ ਕੁਝ
ਮੇਰਾ ਹਮਰਾਜ਼ ਮਿੱਟੀ
ਮੇਰਾ ਰਹਿਬਰ
ਮੇਰਾ ਸਿਰਤਾਜ ਮਿੱਟੀ
ਮੇਰਾ ਮਨ ਮਿੱਟੀ
ਮੇਰਾ ਤਨ ਮਿੱਟੀ
ਜਿਉਂਦਿਆਂ ਪੈਰਾ ਥੱਲੇ
ਮੋਇਆਂ ਉਤੇ ਮਿੱਟੀ
ਮਿੱਟੀ ਤੋਂ ਕਿਉਂ ਡਰਦਾ ਮਨਾਂ
ਮਿੱਟੀ ਨਾਲ ਹੋ ਕੇ ਮਿੱਟੀ
ਇੱਕ ਦਿਨ ਹੋ ਜਾਣਾ ਮਿੱਟੀ ।

ਗੁਰਿੰਦਰ ਸਿੰਘ ✍️ 

Sunday, April 5, 2026

ਬਾਪੂ ਦਾ ਫੋਨ

ਘੰਟੀ ਖੜ੍ਹਕੀ
ਪਿੰਡੋਂ ਫੋਨ ਆਇਆ
ਬਾਪੂ ਲੱਗਿਆ ਦੱਸਣ-
ਬਿਜਲੀ ਆਉਂਦੀ ਨ੍ਹੀਂ
ਮੀਂਹ ਪੈਂਦਾ ਨ੍ਹੀਂ
ਰੋਹੀ ਆਲਾ ਬੋਰ ਬਹਿ ਗਿਆ
ਫਸਲ ਸੁੱਕਗੀ...

ਰੱਬ ਦੀ ਮਰਜ਼ੀ ਐ,
ਆਪਣੇ ਪਿੰਡ
ਬਾਹਮਣ ਤੇ ਸ਼ੇਖ ਲੜ ਪਏ
ਗੁਰਦਵਾਰੇ ਦਾ ਭਾਈ
ਬਲਾਤਕਾਰ ਕਰਦਾ ਫੜਿਆ ਗਿਆ
ਸਰਪੰਚੀ ਪਿੱਛੇ
ਲੜਾਈ ਹੋਗੀ
ਕਤਲ ਹੋ ਗਿਆ...

ਰੱਬ ਦੀ ਮਰਜ਼ੀ ਐ,
ਤੇਰਾ ਤਾਇਆ
ਹਲ਼ਕੇ ਕੁੱਤੇ ਨੇ ਵੱਢ ਲਿਆ
ਚਾਚੀ ਤੇਰੀ ਦੇ
ਭੀਸਰੀ ਗਾਂ ਨੇ ਸਿੰਗ ਮਾਰਿਆ
ਕਈ ਮੁੰਡੇ ਨਸ਼ਾ ਖਾਕੇ ਮਰਗੇ
ਰੇਤਾ ਬਜਰੀ ਮਿਲਦਾ ਨ੍ਹੀਂ
ਕੋਠਾ ਛੱਤਣ ਨੂੰ
ਮੱਛਰ ਬਹੁਤ ਐ...

ਰੱਬ ਦੀ ਮਰਜ਼ੀ ਐ ਪੁੱਤ,
ਰੁਪਈਏ ਦੀ ਕੀਮਤ ਘੱਟਦੀ ਜਾਂਦੀ
ਕਹਿੰਦੇ ਨੇ
ਕੰਧਾਂ ‘ਤੇ ਲਾਉਂਣ ਆਲੇ ਕਾਗਤ ਨਾਲੋਂ
ਸਸਤਾ ਹੋਜੂ
ਗੰਢੇ ਮਹਿੰਗੇ ਹੋਗੇ...

ਸਭ ਰੱਬ ਦੀ ਮਰਜ਼ੀ ਐ,
ਮੈਂ ਕਿਹਾ-
ਨਹੀਂ ਬਾਪੂ
ਕਿਸੇ ਰੱਬ- ਰੁੱਬ ਦੀ ਮਰਜ਼ੀ ਨ੍ਹੀਂ
ਸਭ ਲੀਡਰਾਂ ਦਾ ਬੇੜਾ ਬਹਿ ਗਿਆ
ਪੀ. ਐਚ. ਡੀ. ਕਰ ਕੇ ਵੀ
ਕਨੇਡਾ ‘ਚ ਟਰੱਕ ਚਲਾਉਂਣ ਮੇਰੇ ਵਰਗੇ
ਉਏ ਬਾਪੂ, ਲੀਡਰਾਂ ਦਾ ਬੇੜਾ ਬਹਿ ਗਿਆ
ਉਏ, ਸਭ ਲੀਡਰਾਂ ਦਾ ਬੇੜਾ ਬਹਿ ਗਿਆ......
.........
ਉਏ, ਦੁਸਟਾ
ਤੂੰ ਨ੍ਹੀਂ ਕਦੇ ਰੱਬ ਨੂੰ ਮੰਨਦਾ....
ਕਹਿਕੇ ਬਾਪੂ ਫੋਨ ਕੱਟ ਗਿਆ ।


ਗੁਰਮੇਲ ਬੀਰੋਕੇ, ਕਨੇਡਾ✍️



ਇਸ਼ਕ ਦੀ ਬੇੜੀ , ਸੌਖੀ ਬੰਨੇ ਲਗਦੀ ਨਹੀਂ ।

ਇਸ਼ਕ  ਦੀ  ਬੇੜੀ , ਸੌਖੀ ਬੰਨੇ  ਲਗਦੀ  ਨਹੀਂ ।
ਬਿਰਹੋਂ ਦੇ ਵਿੱਚ, ਤਾਂਘ ਵਸਲ ਦੀ ਤਜਦੀ ਨਹੀਂ ।

ਪਿਆਰ ਆਪਣੇ ਰੰਗ ਵਿੱਚ, ਸੱਭ ਨੂੰ ਰੰਗ ਜਾਂਦਾ,
ਮੁਹੱਬਤ  ਵੰਡਣ  ਨਾਲ,  ਮੁਹੱਬਤ  ਘਟਦੀ  ਨਹੀਂ ।

ਮੇਲ  ਜਦਾਈ,  ਗ਼ਮੀਂ  ਖੁਸ਼ੀ,  ਦੁੱਖ ਦਰਦ ਬਿਨਾਂ,
ਜ਼ਿੰਦਗੀ  ਦੀ  ਨੁਹਾਰ,  ਅਸਲੀ  ਲਗਦੀ   ਨਹੀਂ ।

ਉਸੇ  ਅੱਖ  ਵਿੱਚ  ਘੱਟਾ ਪਾ,  ਉਸ ਕੀ  ਖੱਟਿਆ,
ਤੱਕਦੀ  ਉਸਦਾ  ਰਾਹ,  ਕਦੇ  ਜੋ  ਥੱਕਦੀ  ਨਹੀਂ ।

ਔਖਾ  ਸੌਖਾ,  ਦਿੱਲ  ਅਥਰਾ  ਵੀ  ਸਮਝ ਗਿਆ,
ਕਿ  ਟੁੱਟੀ  ਪੱਤੀ,  ਮੁੜ ਟਾਹਣੀ ਤੇ ਲਗਦੀ ਨਹੀ ।

ਏਦਾਂ ਦਿੱਲ ਨੇ ਸਾਂਭੀਆਂ,  ਕੁੱਝ ਮਿੱਠੀਆਂ  ਯਾਦਾਂ,
ਜੁਦਾਈ  ਹੁੰਦਿਆਂ  ਵੀ,  ਜੁਦਾਈ  ਲਗਦੀ ਨਹੀਂ ।

ਉਸ  ਬੇਵਫ਼ਾ  ਨੂੰ,  ਦੁਰ-ਅਸੀਸ  ਵੀ  ਕਿੰਝ ਦਿਆਂ,
ਆਪਣੀ ਲੱਤ, ਆਪਣੇ ਹੀ ਢਿੱਡ ਵਿੱਚ ਵੱਜਦੀ ਨਹੀਂ ।


ਸਤਿਪਾਲ ਸਿੰਘ ਡੁਲ੍ਹਕੂ✍️