Thursday, February 5, 2026

भली सी एक शक्ल थी

भले दिनों की बात है
भली सी एक शक्ल थी
न ये कि हुस्न-ए-ताम हो
न देखने में आम सी

न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे
मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे

कोई भी रुत हो उस की छब
फ़ज़ा का रंग-रूप थी
वो गर्मियों की छाँव थी
वो सर्दियों की धूप थी

न मुद्दतों जुदा रहे
न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो
न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद
न ये कि इज़्न-ए-आम हो

न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ
कि सादगी गिला करे
न इतनी बे-तकल्लुफ़ी
कि आइना हया करे


न इख़्तिलात में वो रम
कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें
न इस क़दर सुपुर्दगी
कि ज़च करें नवाज़िशें
न आशिक़ी जुनून की
कि ज़िंदगी अज़ाब हो
न इस क़दर कठोर-पन
कि दोस्ती ख़राब हो

कभी तो बात भी ख़फ़ी
कभी सुकूत भी सुख़न
कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ
कभी उदासियों का बन

सुना है एक उम्र है
मुआमलात-ए-दिल की भी
विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या
फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी

सो एक रोज़ क्या हुआ
वफ़ा पे बहस छिड़ गई
मैं इश्क़ को अमर कहूँ
वो मेरी ज़िद से चिड़ गई

मैं इश्क़ का असीर था
वो इश्क़ को क़फ़स कहे
कि उम्र भर के साथ को
वो बद-तर-अज़-हवस कहे

शजर हजर नहीं कि हम
हमेशा पा-ब-गिल रहें
न ढोर हैं कि रस्सियाँ
गले में मुस्तक़िल रहें

मोहब्बतों की वुसअतें
हमारे दस्त-ओ-पा में हैं
बस एक दर से निस्बतें
सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं

मैं कोई पेंटिंग नहीं
कि इक फ़्रेम में रहूँ
वही जो मन का मीत हो
उसी के प्रेम में रहूँ

तुम्हारी सोच जो भी हो
मैं उस मिज़ाज की नहीं
मुझे वफ़ा से बैर है
ये बात आज की नहीं

न उस को मुझ पे मान था
न मुझ को उस पे ज़ोम ही
जो अहद ही कोई न हो
तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी
सो अपना अपना रास्ता
हँसी-ख़ुशी बदल दिया
वो अपनी राह चल पड़ी
मैं अपनी राह चल दिया


भली सी एक शक्ल थी
भली सी उस की दोस्ती ।
अब उस की याद रात दिन
नहीं, मगर कभी कभी ।


अहमद फ़राज़ ✍️




Tuesday, February 3, 2026

शाम कठिन है रात कड़ी है...


शाम कठिन है रात कड़ी है
आओ कि ये आने की घड़ी है

वो है अपने हुस्न में यकता
देख कहाँ तक़दीर लड़ी है

मैं तुम को ही सोच रहा था
आओ तुम्हारी उम्र बड़ी है

काश कुशादा दिल भी रखता
जिस घर की दहलीज़ बड़ी है

फिर बिछड़े दो चाहने वाले
फिर ढोलक पर थाप पड़ी है

वो पहुँचा इमदादी बन कर
जब जब हम पर बिफर पड़ी है

शहर में है इक ऐसी हस्ती
जिस को मिरी तकलीफ़ बड़ी है

हँस ले 'रहबर' वो आए हैं
रोने को तो उम्र पड़ी है  ।


राजेंद्र नाथ रहबर ✍️ 

क्या आज उन से अपनी मुलाक़ात हो गई...

क्या आज उन से अपनी मुलाक़ात हो गई
सहरा पे जैसे टूट के बरसात हो गई

वीरान बस्तियों में मिरा दिन हुआ तमाम
सुनसान जंगलों में मुझे रात हो गई

करती है यूँ भी बात मोहब्बत कभी कभी
नज़रें मिलीं न होंट हिले बात हो गई

ज़ालिम ज़माना हम को अगर दे गया शिकस्त
बाज़ी मोहब्बतों की अगर मात हो गई

हम को निगल सकें ये अँधेरों में दम कहाँ
जब चाँदनी से अपनी मुलाक़ात हो गई

बाज़ार जाना आज सफल हो गया मिरा
बरसों के बा'द उन से मुलाक़ात हो गई 


राजेंद्र नाथ रहबर✍️

Saturday, January 31, 2026

हम न करने के काम करते हैं...

हम न करने के काम करते हैं
और अजब तरह कर गुजरते हैं

मार डालें उसे यह है मक़सूद
सो मिंया जी हम उस पे मरते हैं

मैं हूँ उस शहर में मुक़ीम जहां
अपने होने से लोग डरते हैं

रंग ही क्या तेरे संवरने का
हम लहू थूक कर संवरते हैं

अपने गंगो-जमन में ज़हर था क्या?
हम समंदर का दम जो भरते हैं

नाव समझें भँवर को "जाॅन" जो लोग
बस वही डूब कर उभरते हैं ।


जौन एलिया ✍️ 

झूठे रिश्ते


एक झूठी मुस्कुराहट को 
खुशी कहते रहे, 
सिर्फ़ जीने भर को हम 
क्यों ज़िन्दगी कहते रहे
फासले थे मगर साथ थे
एक झूठे रिश्ते को हम
क्यों बंदगी कहते रहे...!!

सीना दहक रहा हो तो क्या चुप रहे कोई...

सीना दहक रहा हो तो क्या चुप रहे कोई
क्यूँ चीख़ चीख़ कर न गला छील ले कोई

साबित हुआ सुकून-ए-दिल-ओ-जाँ कहीं नहीं
रिश्तों में ढूँढता है तो ढूँडा करे कोई

तर्क-ए-तअल्लुक़ात कोई मसअला नहीं
ये तो वो रास्ता है कि बस चल पड़े कोई

दीवार जानता था जिसे मैं वो धूल थी
अब मुझ को ए'तिमाद की दावत न दे कोई

मैं ख़ुद ये चाहता हूँ कि हालात हों ख़राब
मेरे ख़िलाफ़ ज़हर उगलता फिरे कोई

ऐ शख़्स अब तो मुझ को सभी कुछ क़ुबूल है
ये भी क़ुबूल है कि तुझे छीन ले कोई

हाँ ठीक है मैं अपनी अना का मरीज़ हूँ
आख़िर मिरे मिज़ाज में क्यूँ दख़्ल दे कोई

इक शख़्स कर रहा है अभी तक वफ़ा का ज़िक्र
काश उस ज़बाँ-दराज़ का मुँह नोच ले कोई ।


जौन एलिया ✍️ 

आदमी वक़्त पर गया होगा...

आदमी वक़्त पर गया होगा
वक़्त पहले गुज़र गया होगा

वो हमारी तरफ़ न देख के भी
कोई एहसान धर गया होगा

ख़ुद से मायूस हो के बैठा हूँ
आज हर शख़्स मर गया होगा

शाम तेरे दयार में आख़िर
कोई तो अपने घर गया होगा

मरहम-ए-हिज्र था अजब इक्सीर
अब तो हर ज़ख़्म भर गया होगा ।


जौन एलिया ✍️ 

बहुत दिल को कुशादा कर लिया क्या...

बहुत दिल को कुशादा कर लिया क्या
ज़माने भर से वा'दा कर लिया क्या

तो क्या सच-मुच जुदाई मुझ से कर ली
तो ख़ुद अपने को आधा कर लिया क्या

हुनर-मंदी से अपनी दिल का सफ़्हा
मिरी जाँ तुम ने सादा कर लिया क्या

जो यकसर जान है उस के बदन से
कहो कुछ इस्तिफ़ादा कर लिया क्या

बहुत कतरा रहे हो मुग़्बचों से
गुनाह-ए-तर्क-ए-बादा कर लिया क्या

यहाँ के लोग कब के जा चुके हैं
सफ़र जादा-ब-जादा कर लिया क्या

उठाया इक क़दम तू ने न उस तक
बहुत अपने को माँदा कर लिया क्या

तुम अपनी कज-कुलाही हार बैठीं
बदन को बे-लिबादा कर लिया क्या

बहुत नज़दीक आती जा रही हो
बिछड़ने का इरादा कर लिया क्या ।


जौन एलिया ✍️ 

एक ही मुज़्दा सुब्ह लाती है...

एक ही मुज़्दा सुब्ह लाती है
धूप आँगन में फैल जाती है

रंग-ए-मौसम है और बाद-ए-सबा
शहर कूचों में ख़ाक उड़ाती है

फ़र्श पर काग़ज़ उड़ते फिरते हैं
मेज़ पर गर्द जमती जाती है

सोचता हूँ कि उस की याद आख़िर
अब किसे रात भर जगाती है

मैं भी इज़्न-ए-नवा-गरी चाहूँ
बे-दिली भी तो लब हिलाती है

सो गए पेड़ जाग उठी ख़ुश्बू
ज़िंदगी ख़्वाब क्यूँ दिखाती है

उस सरापा वफ़ा की फ़ुर्क़त में
ख़्वाहिश-ए-ग़ैर क्यूँ सताती है

आप अपने से हम-सुख़न रहना
हम-नशीं साँस फूल जाती है

क्या सितम है कि अब तिरी सूरत
ग़ौर करने पे याद आती है

कौन इस घर की देख-भाल करे
रोज़ इक चीज़ टूट जाती है ।


जौन एलिया ✍️ 

क्या सितम है...

क्या सितम है 
के अब तेरी सूरत, 
ग़ौर करने पे याद आती है। 
कौन इस घर की देखभाल करे, 
रोज़ एक चीज़ टूट जाती है। 


जौन एलिया ✍️