Monday, February 9, 2026

आत्मसमर्पण

मुझे भी युद्ध लड़ना है
किंतु मेरे पास न मिसाइलें हैं
और न ही सैनिकों का जत्था


मुझे नहीं जीतना है कोई देश
न ही कोई क्षेत्र विशेष।


जबकि कुछ नहीं है मेरे पास
सिवाय प्रेम के
तो रख दूँगा अपने हाथ
तुम्हारे हाथों पर और कर दूँगा आत्मसमर्पण


हर बार ज़ंग जीतने के लिए लड़ी जाए
ज़रूरी तो नहीं । 


आदित्य रहबर ✍️ 

गर्माहट

तुम्हारी बाँहों से लिपटते हुए
महसूस किया मैंने
दिसंबर में धूप का निकल आना।


रिश्तों के बीच इतनी गर्माहट तो बची ही रहनी चाहिए
जितनी बची रहती है नमी
अकाल के बावजूद पहाड़ों की तराई में

बचा रहता है चाँद
दिन के उजाले में। 


आदित्य रहबर ✍️ 

रात

रात कल
चुपके से दबे पाँव आई थी मेरे कमरे में
कहा—
कैसी कट रही तुम्हारी रातें ?

चुपचाप ताकता रहा कुछ देर तक उसे
देखा उसके चेहरे पर दो-चार धब्बे इतरा रहे थे
मैंने पूछ दिया—
ये दाग़ कैसे हैं ?

सहम गई
बोली—
इंतज़ार में काटी रातों के निशान हैं
अब तो ये मेरी स्मृतियों के हिस्से हैं
चाहकर भी मिटा नहीं सकती !


मैं अच्छी तरह समझता था
इंतज़ार का अर्थ
पुनः पूछने की इच्छा नहीं हुई

कौन नहीं जानता
इंतज़ार में काटी गई रातें
अमावस्या से भी काली होती हैं


वे धब्बे, धब्बे नहीं थे
आकांक्षाओं की पपड़ियाँ थीं
जो सूख गए हैं
नमी के अभाव में
मेरी आँखों में भी नमी नहीं दिखती
जब झाँकता हूँ उनमें
तो दिखता है रेगिस्तान-सा कुछ
जहाँ चारों तरफ़ रेत ही रेत हैं


जिन्हें इंतज़ार है बरसात का
ताकि मुस्कुरा सके
वे पेड़-पौधे
जिनकी छाँव में हम ढूँढ़ सकें सुकून
जो खो गया है सदियों पहले
इस भाग-दौड़ भरी दुनिया में कहीं । 


आदित्य रहबर ✍️ 

पिता

जब भी किसी पुल से गुज़रता हूँ
याद आते हैं पिता

ज़िंदगी की कितनी ही यात्राएँ
उनके कंधों से होकर गुज़री हैं

पिता के काँधे की लंबाई
दुनिया के किसी भी पुल से लंबी है। 


आदित्य रहबर ✍️ 

स्मृतियाँ

जैसे मृत्यु आती है बिन बताए
और ठंडी पड़ जाती है पूरी देह

तुम भी आना
अपनी स्मृतियों में
ठीक उसी तरह
ठंडी पड़ी देह को एक गर्माहट देने

हमें यह भ्रम तोड़ना होगा कि
देह का ठंडा पड़ जाना ही नहीं होता
मृत्यु का मात्र एक कारण। 


आदित्य रहबर ✍️ 

बहुत बोलने वाली लड़कियाँ

बहुत बोलने वाली लड़कियाँ
काँटा होती हैं
जो चुभती रहती हैं
सभ्य समाज की आँखों में

एक उम्र के बाद चुप रहने लगती हैं
वे लड़कियाँ
और एक समय के बाद,
बना दी जाती हैं
किसी चूल्हे की जलावन। 


आदित्य रहबर ✍️ 

प्रेम

कितना अजीब है—
यह जानते हुए भी किसी के प्रेम में होना
कि हम कभी नहीं मिलेंगे।


इससे भी अजीब है
यह जानते हुए
प्रेम में नहीं होना। 


आदित्य रहबर ✍️ 

किताबें

किसी मुल्क की क़ाबिलियत
वहाँ की किताबों से आँकी जा सकती है
धर्मस्थलों या इमारतों से नहीं


किताबों का अलग एक अपना धर्म होता है
जहाँ विज्ञान साँस लेता है
मानवता मुस्कुराती है।

किताबें हर युग में
युद्धों के ख़िलाफ़ खड़ी रही हैं
परमाणु-परीक्षण से ज़्यादा
इस दुनिया को किताबें पलटने की ज़रूरत है

किताबों से बड़ा युद्ध नहीं इस दुनिया में
बर्बरता के ख़िलाफ़। 


आदित्य रहबर ✍️ 

प्यास का मज़हब...

भूख
भूख होती है
प्यास
प्यास।

अक्सर मैंने ऐसा सोचा
किंतु दुनिया मेरे मन से कहाँ चलती है?
पानी कभी गंगा
तो कभी आब-ए-ज़म-ज़म हो जाता है

भूख
कभी पेट की
मज़हब की
कट्टरता की
तो कभी वासना की हो जाती है

किसने बनाई यह रीत
ये क़ायदे-कानून?

प्यास सरहद और मज़हब
देखकर तो नहीं लगती

आब-ए-ज़मज़म हो या गंगा
आख़िर पानी ही तो है
प्यास ही तो बुझाती है

नफ़रत की रेत
ऐसे ही उड़ती रही
तो न यहाँ पानी बचेगा
न मज़हब
न हम
सिवाय बंजर पड़ी भूमि के


जहाँ वसंत नहीं आएगा
फूल नहीं खिलेंगे
अगर कुछ होंगे
तो सिर्फ़ काँटे
और काँटे कभी प्यास नहीं बुझाते
वे तो सिर्फ़ चुभना जानते हैं। 


आदित्य रहबर ✍️ 

पूर्णता

जिनके हिस्से नहीं आया प्रेम
अंततः उन्होंने ही दिया दुनिया को

प्रेम का सबसे सुंदर संदेश
प्रेम में असफल रहे प्रेमियों ने ही लिखे

दुनिया के सबसे सुंदर प्रेमपत्र
रास्ता भटक गई नदियों ने ही की

नए शहरों की खोज
जहाँ रिक्तता है

वहीं पूर्णता है। 


आदित्य रहबर ✍️