Tuesday, March 24, 2026

क्या करूं....


कतरा के ज़िंदगी से गुज़र जाऊँ,
क्या करूँ,
रुस्वाइयों के ख़ौफ़ से मर जाऊँ, क्या करूँ...

मैं क्या करूँ कि तेरी अना को सुकूँ मिले,
गिर जाऊँ टूट जाऊँ बिखर जाऊँ, क्या करूँ...

फिर आ के लग रहे हैं परों पर हवा के तीर,
परवाज़ अपनी रोक लूँ डर जाऊँ, क्या करूँ...

जंगल में बे-अमान सी बैठी हुई हूँ मैं,
आवाज़ किस को दूँ मैं, किधर जाऊँ, क्या करूँ...

क्या हुक्म आप का है मिरे वास्ते हुज़ूर,
जारी सफ़र रखूँ कि ठहर जाऊँ, क्या करूँ...

कब तक सुनूँ बहार में ख़ुशबू की दस्तकें,
क्यों ऐ ग़म-ए-हयात सँवर जाऊँ, क्या करूँ..!!



नुसरत मेंहदी ✍️

Monday, March 23, 2026

बारिश


सआदत हसन मंटो ✍️ 

स्टोरीलाइन

"यह एक नौजवान के ना-मुकम्मल इश्क़ की दास्तान है। तनवीर अपनी कोठी से बारिश में नहाती हुई दो लड़कियों को देखता है। उनमें से एक लड़की पर मुग्ध हो जाता है। एक दिन वो लड़की उससे कार में लिफ़्ट माँगती है और तनवीर को ऐसा महसूस होता है कि उसे अपनी मंज़िल मिल गई है लेकिन बहुत जल्द उसे मालूम हो जाता है कि वो वेश्या है और तनवीर उदास हो जाता है।" 


बारिश 

मूसलाधार बारिश हो रही थी और वो अपने कमरे में बैठा जल-थल देख रहा था... बाहर बहुत बड़ा लॉन था, जिसमें दो दरख़्त थे। उनके सब्ज़ पत्ते बारिश में नहा रहे थे। उसको महसूस हुआ कि वो पानी की इस यूरिश से ख़ुश होकर नाच रहे हैं।

उधर टेलीफ़ोन का एक खंबा गड़ा था, उसके फ़्लैट के ऐन सामने। ये भी बड़ा मसरूर नज़र आता था, हालाँकि उसकी मसर्रत की कोई वजह मालूम नहीं होती थी। इस बेजान शय को भला मसरूर क्या होना था लेकिन तनवीर ने जोकि बहुत मग़्मूम था, यही महसूस किया कि उसके आस-पास जो भी शय है, ख़ुशी से नाच-गा रही है।

सावन गुज़र चुका था और बारान-ए-रहमत नहीं हुई थी। लोगों ने मस्जिदों में इकट्ठे होकर दुआएं मांगीं, मगर कोई नतीजा बरामद न हुआ। बादल आते और जाते रहे, मगर उनके थनों से पानी का एक क़तरा भी न टपका।

आख़िर एक दिन अचानक काले काले बादल आसमान पर घिर आए और छाजों पानी बरसने लगा। तनवीर को बादलों और बारिशों से कोई दिलचस्पी नहीं थी... उसकी ज़िंदगी चटियल मैदान बन चुकी थी जिसके मुँह में पानी का एक क़तरा भी किसी ने न टपकाया हो।

दो बरस पहले, उसने एक लड़की से जिसका नाम सुरय्या था, मुहब्बत करना शुरू की, मगर यक-तरफ़ा मुहब्बत थी। सुरय्या ने उसे दरखोर-ए-एतिना ही न समझा।

सावन के दिन थे, बारिश हो रही थी। वो अपनी कोठी से बाहर निकला। जांगिया पहन कर नहाए और बारिश का लुत्फ़ उठाए। आम बाल्टी में पड़े थे। वो अकेला बैठा उन्हें चूस रहा था कि अचानक उसे चीख़ें और क़हक़हे सुनाई दिए।

उसने देखा कि साथ वाली कोठी के लॉन में दो लड़कियां बारिश में नहा रही हैं और ख़ुशी में शोर मचा रही हैं। उसकी कोठी और साथ वाली कोठी के दरमियान सिर्फ़ एक झाड़ियों की दीवार हाइल थी।

तनवीर उठा... आम का रस चूसते हुए वो बाड़ के पास गया और ग़ौर से उन दोनों लड़कियों को देखा।

दोनों महीन मलमल के कुर्ते पहने थीं, जो उनके बदन के साथ चिपके हुए थे। शलवार चूँकि लट्ठे की थीं इसलिए तनवीर को उनके बदन के निचले हिस्से के सही ख़द्द-ओ-ख़ाल का पता न चल सका।

उसने पहले किसी औरत को ऐसी नज़रों से कभी नहीं देखा था, जैसा कि उस रोज़, जबकि बारिश हो रही थी, उसने उन दोनों लड़कियों को देखा... देर तक वो उनको देखता रहा जो बारिश में भीग भीग कर ख़ुशी के नारे बुलंद कर रही थीं।

तनवीर ने उनको पहले कभी नहीं देखा था, इसलिए कि वो तबअन कुछ इस क़िस्म का लड़का था कि वो किसी लड़की को बुरी नज़रों से देखना गुनाह समझता था मगर उसने उस रोज़ बड़ी ललचाई नज़रों से उनको देखा... देखा ही नहीं, बल्कि उनके गीले बदन में अंगारा बन कर बर्मे की तरह छेद करता रहा।

तनवीर की उम्र उस वक़्त बीस बरस के क़रीब होगी। नातजुर्बेकार था। ज़िंदगी में उसने पहली मर्तबा जवान लड़कियों के शबाब को गीली मलमल में लिपटे देखा, तो उसने यूं महसूस किया कि उसके ख़ून में चिनगारियां दौड़ रही हैं।

उसने उन लड़कियों में से एक को मुंतख़ब करना चाहा... देर तक वो ग़ौर करता रहा... एक लड़की बड़ी शरीर थी... दूसरी उससे कम। उसने सोचा शरीर अच्छी रहेगी जो उसको शरारतों का सबक़ दे सके।

ये शरीर लड़की ख़ूबसूरत थी, उसके बदन के आज़ा भी बहुत मुनासिब थे। बारिश में नहाती जलपरी मालूम होती थी। थोड़ी देर के लिए तनवीर शायर बन गया। उसने कभी इस तौर पर नहीं सोचा था। लेकिन उस लड़की ने जिसका कुरता दूसरी के मुक़ाबले में बहुत ज़्यादा महीन था, उसको ऐसे ऐसे शेर याद करा दिए जिनको अर्सा हुआ भूल चुका था।

इसके इलावा रेडियो पर सुने हुए फ़िल्मी गानों की धुनें भी उसके कानों में गूंजने लगीं और उसने बाड़ के पीछे ये महसूस करना शुरू किया कि वो अशोक कुमार है... दिलीप कुमार है... फिर उसे कामिनी कौशल और नलिनी जयवंत का ख़याल आया... मगर उसने जब उस लड़की की तरफ़ इस ग़रज़ से देखा कि उसमें कामिनी कौशल और नलिनी जयवंत के ख़द्द-ओ-ख़ाल नज़र आजाऐं तो उसने उन दोनों एक्ट्रसों पर लानत भेजी... वो उनसे कहीं ज़्यादा हसीन थी। उसके मलमल के कुरते में जो शबाब था, उसका मुक़ाबला उसने सोचा, कोई भी नहीं कर सकता।

तनवीर ने आम चूसने बंद कर दिए और उस लड़की से जिसका नाम प्रवीण था, इश्क़ लड़ाना शुरू कर दिया।

शुरू शुरू में उसे बड़ी मुश्किलात पेश आईं, इसलिए कि उस लड़की तक रसाई तनवीर को आसान नहीं मालूम होती थी।

फिर उसे अपने वालिदैन का भी डर था। इसके इलावा उसे ये भी यक़ीन था कि वो उससे मुलतफ़ित होगी या नहीं?

बहुत देर तक वो उन्ही उलझनों में गिरफ़्तार रहा... रातें जागता... झाड़ियों की पस्त क़द झाड़ के पास जाता मगर वो नज़र न आती। घंटों वहां खड़ा रहता, और वो बारिश वाला मंज़र जो उसने देखा था, आँखें बंद करके ज़ेहन में दुहराता रहता।

बहुत दिनों के बाद आख़िर उसको एक रोज़ उससे मुलाक़ात का मौक़ा मिल गया, वो अपने बाप की कार में घर के किसी काम की ग़रज़ से जा रहा था कि परवीन से उसकी मुडभेड़ होगई। वो कार स्टार्ट कर चुका था कि साथ वाली कोठी में तनवीर के ख़्वाबों की शहज़ादी निकली। उसने हाथ से इशारा किया कि वो मोटर रोक ले।

तनवीर घबरा गया... हर आशिक़ ऐसे मौक़ों पर घबरा ही जाया करता है। उसने मोटर कुछ ऐसे बेंडे अंदाज़ में रोकी कि उसको ज़बरदस्त धचका लगा... उसका सर ज़ोर से स्टेरिंग व्हील के साथ टकराया, मगर उस वक़्त वो शराब के नशे से ज़्यादा मख़मूर था। उसको उसकी महबूबा ने ख़ुद मुख़ातिब किया था।

परवीन के होंटों पर गहरे सुर्ख़ रंग की लिपस्टिक थोपी हुई थी... उसने सुर्ख़ मुस्कुराहट से कहा, “माफ़ फ़रमाईएगा मैंने आपको तकलीफ़ दी... बारिश हो रही है... ताँगा इस दूर-दराज़ जगह मिलना मुहाल है और मुझे एक ज़रूरी काम से जाना था। आप मेरे हमसाए हैं इसीलिए आपको ये ज़हमत दी।”

तनवीर ने कहा, “ज़हमत का क्या सवाल पैदा होता है... मैं तो... मैं तो...” उसकी ज़बान लड़खड़ा गई, “आप से मेरा तआरुफ़ तो नहीं लेकिन आपको एक बार देखा था।”

परवीन अपनी सुर्ख़ मुस्कुराहटों के साथ कार में बैठ गई और तनवीर से पूछा, “आपने मुझे कब देखा था।”

तनवीर ने जवाब दिया, “आपकी कोठी के लॉन में... जब आप... जब आप और आपके साथ एक और लड़की बारिश में नहा रही थीं।”

परवीन ने अपने गहरे सुर्ख़ लबों में से चीख़ नुमा आवाज़ निकाली, “हाय... आप देख रहे थे?”

“ये गुस्ताख़ी मैंने ज़रूर की... इसके लिए माफ़ी चाहता हूँ।”

परवीन ने एक अदा के साथ उससे पूछा, “आपने देखा क्या था?”

ये सवाल ऐसा था कि तनवीर उसका जवाब नहीं दे सकता था, आएं बाएं शाएं कर के रह गया, “जी कुछ नहीं... बस आपको... मेरा मतलब है कि दो लड़कियां थीं जो बारिश में नहा रही थीं और... और ख़ुश हो रही थीं... मैं उस वक़्त आम चूस रहा था।”

परवीन के गहरे सुर्ख़ लबों पर शरीर मुस्कुराहट पैदा हुई, “आप आम चूसते क्यों हैं... काट कर क्यों नहीं खाते?”

तनवीर ने मोटर स्टार्ट कर दी। उसकी समझ में न आया कि इस सवाल का जवाब क्या दे, चुनांचे वो गोल कर गया, “आपको मैं कहाँ ड्राप कर दूं।”

परवीन मुस्कुराई, “आप मुझे कहीं भी ड्राप कर दें, वही मेरी मंज़िल होगी।”

तनवीर ने यूं महसूस किया कि उसे अपनी मंज़िल मिल गई है। लड़की जो उसके पहलू में बैठी है अब उसी की है लेकिन उसमें इतनी जुर्रत नहीं थी कि वो उसका हाथ दबाये या उसकी कमर में एक दो सेकंड के लिए अपना बाज़ू हमायल कर दे।

बारिश हो रही थी मौसम बहुत ख़ुशगवार था, उसने काफ़ी देर सोचा, मोटर की रफ़्तार उसके ख़यालात के साथ साथ तेज़ होती गई। आख़िर उसने एक जगह उसे रोक लिया और जज़्बात से मग़्लूब हो कर उसको अपने साथ चिमटा लिया उसके होंटों से अपने होंट पैवस्त कर दिए... उसको ऐसा महसूस हुआ कि वो कोई बहुत ही लज़ीज़ आम चूस रहा है परवीन ने कोई मुज़ाहमत न की।

लेकिन फ़ौरन तनवीर को ये एहसास बड़ी शिद्दत से हुआ कि उसने बड़ी नाशाइस्ता हरकत की है और ग़ालिबन परवीन को उसकी ये हरकत पसंद नहीं आई, चुनांचे एक दम संजीदा हो कर उसने कहा, “आपको कहाँ जाना है?”

परवीन के चेहरे पर यूं ख़फ़गी के कोई आसार नहीं थे लेकिन तनवीर यूं महसूस कर रहा था जैसे वो उसके ख़ून की प्यासी है।

परवीन ने उसे बता दिया कि उसे कहाँ जाना है... जब वो उस जगह पहुंचा तो उसे मालूम हुआ वो रन्डियों का चकला है... जब उसने परवीन को मोटर से उतारा तो उसके होंटों पर गहरे लाल रंग की मुस्कुराहट बिखर रही थी। उसने कूल्हे मटका कर ठेट कस्बियों के अंदाज़ में उससे कहा, “शाम को मैं यहां होती हूँ... आप कभी ज़रूर तशरीफ़ लाईए।”

तनवीर जब भौंचक्का हो कर अपनी मोटर की तरफ़ बढ़ा तो उसे ऐसा लगा कि वो भी एक कस्बी औरत है जिसे वो हर रोज़ चलाता है, उसकी लाल बत्ती लिपस्टिक है जो परवीन ने होंटों पर थोपी हुई थी।

वो वापस अपनी कोठी चला आया... बारिश हो रही थी और तनवीर बेहद मग़्मूम था... उसको ऐसा महसूस हुआ कि उसकी आँखों के आँसू बारिश के क़तरे बन कर टपक रहे हैं।


कौन आया रास्ते आईना-ख़ाने हो गए ...

कौन आया रास्ते आईना-ख़ाने हो गए 
रात रौशन हो गई दिन भी सुहाने हो गए

क्यूँ हवेली के उजड़ने का मुझे अफ़सोस हो 
सैकड़ों बे-घर परिंदों के ठिकाने हो गए 

जाओ उन कमरों के आईने उठा कर फेंक दो 
बे-अदब ये कह रहे हैं हम पुराने हो गए

पलकों पर ये आँसू प्यार की तौहीन थे 
उसकी आँखों से गिरे मोती के दाने हो गए

ये भी मुमकिन है कि मैं ने उस को पहचाना न हो 
अब उसे देखे हुए कितने ज़माने हो गए  ।


बशीर बद्र ✍️ 

नज़र से फूल चुनती है नज़र आहिस्ता आहिस्ता ....

नज़र से फूल चुनती है नज़र आहिस्ता आहिस्ता 
मोहब्बत रंग लाती है मगर आहिस्ता आहिस्ता

दु'आएँ दे रहे हैं पेड़ मौसम जोगिया सा है 
तुम्हारा साथ है जब से हर इक मंज़र नया सा है 
हसीं लगने लगी हर रहगुज़र आहिस्ता आहिस्ता

बहुत अच्छे हो तुम फिर भी हमें तुम से हया क्यों है 
तुम्हीं बोलो हमारे दरमियाँ ये फ़ासला क्यों है 
मज़ा जब है कि तय हो ये सफ़र आहिस्ता आहिस्ता

हमेशा से अकेले-पन में कोई मुस्कुराता है 
ये रिश्ता प्यार का है आसमाँ से बन के आता है 
मगर होती है दिल को ये ख़बर आहिस्ता आहिस्ता ।


निदा फ़ाज़ली ✍️ 

Friday, March 20, 2026

मुझे उतनी दूर मत ब्याहना...

मुझे उतनी दूर मत ब्याहना
जहाँ मुझसे मिलने जाने ख़ातिर
घर की बकरियाँ बेचनी पड़े तुम्हे

मत ब्याहना उस देश में
जहाँ आदमी से ज़्यादा 
ईश्वर बसते हों

जंगल नदी पहाड़ नहीं हों जहाँ
वहाँ मत कर आना मेरा लगन 

वहाँ तो कतई नही
जहाँ की सड़कों पर
मान से भी ज़्यादा तेज़ दौड़ती हों मोटर-गाडियाँ
ऊँचे-ऊँचे मकान 
और दुकानें हों बड़ी-बड़ी

उस घर से मत जोड़ना मेरा रिश्ता
उस घर से मत जोड़ना मेरा रिश्ता
जिस घर में बड़ा-सा खुला आँगन न हो
मुर्गे की बाँग पर जहाँ होती ना हो सुबह
और शाम पिछवाडे से जहाँ 
पहाडी पर डूबता सूरज ना दिखे ।

मत चुनना ऐसा वर 
जो पोचाई[1] और हंडिया में 
डूबा रहता हो अक्सर 

काहिल निकम्मा हो 
माहिर हो मेले से लड़कियाँ उड़ा ले जाने में
ऐसा वर मत चुनना मेरी ख़ातिर
जो बात-बात में बात करे लाठी-डंडे की
कोई थारी लोटा तो नहीं 
कि बाद में जब चाहूँगी बदल लूँगी
अच्छा-ख़राब होने पर

जो बात-बात में 
बात करे लाठी-डंडे की
निकाले तीर-धनुष कुल्हाडी
जब चाहे चला जाए बंगाल, आसाम, कश्मीर 
ऐसा वर नहीं चाहिए मुझे
और उसके हाथ में मत देना मेरा हाथ
जिसके हाथों ने कभी कोई पेड़ नहीं लगाया 
फसलें नहीं उगाई जिन हाथों ने
जिन हाथों ने नहीं दिया कभी किसी का साथ
किसी का बोझ नही उठाया

और तो और
जो हाथ लिखना नहीं जानता हो "ह" से हाथ
उसके हाथ में मत देना कभी मेरा हाथ
महुआ का लट और खजूर का गुड़
ब्याहना तो वहाँ ब्याहना 
जहाँ सुबह जाकर 
शाम को लौट सको पैदल

मैं कभी दुःख में रोऊँ इस घाट 
तो उस घाट नदी में स्नान करते तुम 
सुनकर आ सको मेरा करुण विलाप.....

महुआ का लट और
खजूर का गुड़ बनाकर भेज सकूँ सन्देश 
तुम्हारी ख़ातिर
उधर से आते-जाते किसी के हाथ
भेज सकूँ कद्दू-कोहडा, खेखसा[2], बरबट्टी[3],
समय-समय पर गोगो के लिए भी
मेला हाट जाते-जाते
मेला हाट जाते-जाते
मिल सके कोई अपना जो
बता सके घर-गाँव का हाल-चाल 
चितकबरी गैया के ब्याने की ख़बर
दे सके जो कोई उधर से गुजरते
ऐसी जगह में ब्याहना मुझे

उस देश ब्याहना 
जहाँ ईश्वर कम आदमी ज़्यादा रहते हों
बकरी और शेर 
एक घाट पर पानी पीते हों जहाँ
वहीं ब्याहना मुझे!

निर्मला पुतुल ✍️

Thursday, March 19, 2026

ਦੁੱਖਾਂ ਭਰਿਆ ਦਿਲ ਪੈਮਾਨਾ ਛੱਡ ਪਰੇ...

ਦੁੱਖਾਂ ਭਰਿਆ ਦਿਲ ਪੈਮਾਨਾ ਛੱਡ ਪਰੇ
ਕੀ ਇਹ ਹਸਤੀ ਦਾ ਮੈਖ਼ਾਨਾ ਛੱਡ ਪਰੇ

ਚਲ ਮੁੜ ਚਲੀਏ ਏਸ ਸਫ਼ਰ ਤੋਂ ਕੀ ਲੈਣਾ
ਵੀਰਾਨੇ ਅੱਗੇ ਵੀਰਾਨਾ ਛੱਡ ਪਰੇ

ਦੇ ਕੇ ਜਾਨ ਵੀ ਛੁਟ ਜਾਈਏ ਤਾਂ ਚੰਗਾ ਹੈ
ਭਰ ਦੇ ਜੀਵਨ ਦਾ ਜੁਰਮਾਨਾ ਛੱਡ ਪਰੇ

ਪੰਛੀ ਦਾ ਦਿਲ ਕੰਬੇ ਤੇਰੇ ਹਥ ਕੰਬਣ
ਤੈਥੋਂ ਲਗਣਾ ਨਹੀਂ ਨਿਸ਼ਾਨਾ ਛੱਡ ਪਰੇ

ਬੁੱਢਿਆਂ ਘਾਗਾਂ ਨਾਲ ਸਵਾਲ ਜਵਾਬ ਨਾ ਕਰ
ਖਾ ਪੀ ਲੈ ਕੁਝ ਰੋਜ਼ ਜੁਆਨਾ ਛੱਡ ਪਰੇ

ਢਕੀ ਰਹਿਣ ਦੇ ਸਾਡੇ ਨਾਲ ਹਿਸਾਬ ਨਾ ਕਰ
ਪਛਤਾਵੇਂਗਾ ਬੇਈਮਾਨਾ ਛੱਡ ਪਰੇ

ਸੋਚੇਗਾਂ ਤਾਂ ਸ਼ੱਕਰ ਵਿਹੁ ਹੋ ਜਾਏਗੀ
ਕੀ ਅਪਣਾ ਤੇ ਕੀ ਬੇਗ਼ਾਨਾ ਛੱਡ ਪਰੇ

ਤੈਥੋਂ ਨਈਂ ਉਠਣੇ ਇਹ ਅੱਖਰ ਹੰਝੂਆਂ ਦੇ
ਰਹਿਣ ਦੇ ਤੂੰ ਵੱਡਿਆ ਵਿਦਵਾਨਾ ਛੱਡ ਪਰੇ ।


ਸੁਰਜੀਤ ਪਾਤਰ ✍️

ਹੈ ਮੇਰੇ ਸੀਨੇ 'ਚ ਕੰਪਨ ਮੈਂ ਇਮਤਿਹਾਨ 'ਚ ਹਾਂ...

ਹੈ ਮੇਰੇ ਸੀਨੇ 'ਚ ਕੰਪਨ ਮੈਂ ਇਮਤਿਹਾਨ 'ਚ ਹਾਂ
ਮੈਂ ਖਿੱਚਿਆ ਤੀਰ ਹਾਂ ਐਪਰ ਅਜੇ ਕਮਾਨ 'ਚ ਹਾਂ

ਹਾਂ ਤੇਗ ਇਸ਼ਕ ਦੀ ਪਰ ਆਪਣੇ ਹੀ ਸੀਨੇ ਵਿਚ
ਕਦੇ ਮੈਂ ਖੌਫ ਕਦੇ ਰਹਿਮ ਦੀ ਮਿਆਨ 'ਚ ਹਾਂ

ਬਚਾਈਂ ਅੱਜ ਤੂੰ ਕਿਸੇ ਸੀਨੇ ਲੱਗਣੋਂ ਮੈਨੂੰ
ਕਿ ਅੱਜ ਮੈਂ ਪੰਛੀ ਨਹੀਂ, ਤੀਰ ਹਾਂ, ਉਡਾਨ 'ਚ ਹਾਂ

ਜ਼ਮੀਨ ਰਥ ਹੈ ਮੇਰਾ, ਬਿਰਖ ਨੇ ਮੇਰੇ ਪਰਚਮ
ਤੇ ਮੇਰਾ ਮੁਕਟ ਹੈ ਸੂਰਜ, ਮੈਂ ਬਹੁਤ ਸ਼ਾਨ 'ਚ ਹਾਂ

ਰਲੀ ਅਗਨ 'ਚ ਅਗਨ, ਜਲ 'ਚ ਜਲ, ਹਵਾ 'ਚ ਹਵਾ,
ਕਿ ਵਿਛੜੇ ਸਾਰੇ ਮਿਲੇ, ਮੈਂ ਅਜੇ ਉਡਾਨ 'ਚ ਹਾਂ

ਤੇਰਾ ਖਿਆਲ ਮੇਰੇ ਸੀਨੇ ਨਾਲ ਲੱਗਿਆ ਹੈ
ਹੈ ਰਾਤ ਹਿਜ਼ਰ ਦੀ ਪਰ ਮੈਂ ਅਮਨ ਅਮਾਨ 'ਚ ਹਾਂ

ਮੈਂ ਕਿਸ ਦੇ ਨਾਲ ਕਰਾਂ ਗੁਫਤਗੂ ਕਿ ਕੋਈ ਨਹੀਂ
ਮੇਰੇ ਬਗੈਰ, ਮੇਰੇ ਰੱਬ, ਮੈਂ ਜਿਸ ਜਹਾਨ 'ਚ ਹਾਂ

ਛੁਪਾ ਕੇ ਰੱਖਦਾ ਹਾਂ ਤੈਥੋਂ ਮੈਂ ਤਾਜ਼ੀਆਂ ਨਜ਼ਮਾਂ
ਮਤਾਂ ਤੂੰ ਜਾਣ ਕੇ ਰੋਵੇਂ ਮੈਂ ਕਿਸ ਜਹਾਨ 'ਚ ਹਾਂ

ਇਹ ਲਫਜ਼ ਮੇਰੇ ਨਹੀਂ ਪਰ ਇਹ ਵਾਕ ਮੇਰਾ ਹੈ
ਜਾਂ ਖਬਰੇ ਇਹ ਵੀ ਨਹੀ ਐਵੇਂ ਮੈਂ ਗੁਮਾਨ 'ਚ ਹਾਂ ।


ਸੁਰਜੀਤ ਪਾਤਰ ✍️ 

ਤੂੰ ਬੇਚੈਨ ਕਿਉਂ ਹੈਂ ਤੂੰ ਰੰਜੂਰ ਕਿਉਂ ਹੈਂ...

ਤੂੰ ਬੇਚੈਨ ਕਿਉਂ ਹੈਂ ਤੂੰ ਰੰਜੂਰ ਕਿਉਂ ਹੈਂ
ਤੂੰ ਸੀਨੇ ਨੂੰ ਲੱਗ ਕੇ ਵੀ ਇਉਂ ਦੂਰ ਕਿਉਂ ਹੈਂ

ਕਿਵੇਂ ਬਲ ਰਿਹੈਂ ਤੂੰ ਉਹ ਕੀ ਜਾਣਦੇ ਨੇ
ਜੁ ਪੁੱਛਦੇ ਨੇ ਤੂੰ ਏਨਾ ਪੁਰਨੂਰ ਕਿਉਂ ਹੈਂ

ਉਹ ਸੂਲੀ ਚੜ੍ਹਾ ਕੇ ਉਹਨੂੰ ਪੁੱਛਦੇ ਨੇ
ਤੂੰ ਸਾਡੇ ਤੋਂ ਉੱਚਾ ਐਂ ਮਨਸੂਰ ਕਿਉਂ ਹੈਂ

ਉਹ ਆਪਣੇ ਹੀ ਦਿਲ ਦੀ ਅਗਨ ਸੀ ਰੌਸ਼ਨ
ਉਹ ਪੁੱਛਦੇ ਸੀ ਤੂੰ ਏਨਾ ਮਸ਼ਹੂਰ ਕਿਉਂ ਹੈਂ

ਜੁ ਧਰਤੀ ਵੀ ਭੁੱਲਿਆ ਤੇ ਨੀਹਾਂ ਵੀ ਭੁੱਲਿਐ
ਤੂੰ ਗੁੰਬਦ ਏਂ ਪਰ ਏਨਾ ਮਗਰੂਰ ਕਿਉਂ ਹੈਂ

ਬਣਾ ਖੁਦ ਮੁਹੱਬਤ ਦਾ ਪੁਲ ਤੂੰ ਖੁਦਾ ਤਕ
ਕਿ ਤੂੰ ਠੇਕੇਦਾਰਾਂ ਦਾ ਮਜ਼ਦੂਰ ਕਿਉਂ ਹੈਂ

ਹਵਾਵਾਂ 'ਚ ਕਿਉਂ ਨਈਂ ਤੂੰ ਲਿਖਦਾ ਮੁਹੱਬਤ
ਤੂੰ ਸ਼ਾਇਰ ਏਂ ਫਿਰ ਏਨਾ ਮਜ਼ਬੂਰ ਕਿਉਂ ਹੈਂ ।


ਸੁਰਜੀਤ ਪਾਤਰ ✍️ 

ਨਿੱਤ ਸੂਰਜਾਂ ਨੇ ਚੜ੍ਹਨਾ, ਨਿੱਤ ਸੂਰਜਾਂ ਨੇ ਲਹਿਣਾ...

ਨਿੱਤ ਸੂਰਜਾਂ ਨੇ ਚੜ੍ਹਨਾ, ਨਿੱਤ ਸੂਰਜਾਂ ਨੇ ਲਹਿਣਾ
ਪਰਬਤ ਤੋਂ ਸਾਗਰਾਂ ਵੱਲ ਨਦੀਆਂ ਨੇ ਰੋਜ਼ ਵਹਿਣਾ
ਇਕ ਦੂਜੇ ਮਗਰ ਘੁੰਮਣਾ ਰੁੱਤਾਂ ਤੇ ਮੌਸਮਾਂ ਨੇ
ਇਹ ਸਿਲਸਿਲਾ ਜੁਗੋ ਜੁਗ ਏਦਾਂ ਹੀ ਚੱਲਦਾ ਰਹਿਣਾ

ਰੁਕਣੀ ਨਹੀਂ ਕਹਾਣੀ, ਬੱਝੇ ਨ ਰਹਿਣੇ ਪਾਣੀ
ਰੂਹੋਂ ਬਗੈਰ ਸੱਖਣੇ, ਬੁਤ ਨਾ ਬਣਾ ਕੇ ਰੱਖਣੇ
ਪਾਣੀ ਨੇ ਰੋਜ਼ ਤੁਰਨਾ, ਕੰਢੀਆਂ ਨੇ ਰੋਜ਼ ਖੁਰਨਾ
ਖੁਰਦੇ ਨੂੰ ਦੇ ਦਿਲਾਸਾ, ਤੁਰਦੇ ਨੇ ਨਾਲ ਰਹਿਣਾ

ਚੰਨ ਤਾਰਿਆਂ ਦੀ ਲੋਏ, ਇਕਰਾਰ ਜਿਹੜੇ ਹੋਏ
ਤਾਰੇ ਉਨਾਂ ਤੇ ਹੱਸੇ ਦੀਵੇ ਉਨਾਂ 'ਤੇ ਰੋਏ
ਟੁੱਟਦੇ ਕਰਾਰ ਦੇਖੇ, ਅਸਾਂ ਬੇਸ਼ੁਮਾਰ ਦੇਖੇ
ਲਫਜਾਂ ਦਾ ਬਣਿਆ ਦੇਖੀਂ ਕੱਲ ਇਹ ਮਹਿਲ ਵੀ ਢਹਿਣਾ

ਇਨ੍ਹਾਂ ਦੀਵਿਆਂ ਨੂੰ ਦੱਸ ਦੇ, ਇਨਾਂ ਤਾਰਿਆਂ ਨੂੰ ਕਹਿ ਦੇ
ਇਨ੍ਹਾਂ ਹੱਸਦੇ ਰੋਂਦਿਆਂ ਨੂੰ ਤੂੰ ਸਾਰਿਆਂ ਨੂੰ ਕਹਿ ਦੇ
ਅਸੀਂ ਜਾਨ ਵਲੋਂ ਦੀਵੇ, ਈਮਾਨ ਵਲੋਂ ਤਾਰੇ
ਅਸੀਂ ਦੀਵੇ ਵਾਂਗ ਬੁਝਣਾ, ਅਸੀਂ ਤਾਰੇ ਵਾਂਗ ਰਹਿਣਾ

ਸੁਣ ਹੇ ਝਨਾਂ ਦੇ ਪਾਣੀ, ਤੁੰ ਡੁੱਬ ਗਏ ਨ ਜਾਣੀਂ
ਤੇਰੇ ਪਾਣੀਆਂ ਤੇ ਤਰਨੀ ਇਸ ਪਿਆਰ ਦੀ ਕਹਾਣੀ
ਹੈ ਝੂਠ ਮਰ ਗਏ ਉਹ, ਡੁੱਬ ਕੇ ਤਾਂ ਤਰ ਗਏ ਉਹ
ਨਿੱਤ ਲਹਿਰਾਂ ਤੇਰੀਆਂ ਨੇ ਪਾ ਪਾ ਕੇ ਸ਼ੋਰ ਕਹਿਣਾ ।


ਸੁਰਜੀਤ ਪਾਤਰ ✍️ 

ਧੁੱਪ ਸੂਰਜ ਦੀ ਦਿਖਾਵੇ ਹੋਰ ਰਾਹ...

ਧੁੱਪ ਸੂਰਜ ਦੀ ਦਿਖਾਵੇ ਹੋਰ ਰਾਹ
ਚਾਨਣੀ ਵਿਚ ਹੋਰ ਰਸਤੇ ਚਮਕਦੇ
ਹੋਰ ਮੰਜ਼ਿਲ ਦੱਸਦਾ ਘਰ ਦਾ ਚਿਰਾਗ
ਸਿਵਿਆਂ ਲੋਏ ਹੋਰ ਪਗ-ਚਿੰਨ੍ਹ ਸੁਲਗਦੇ

ਇਹ ਸਿਵਾ, ਇਹ ਚੰਨ, ਸੂਰਜ, ਇਹ ਚਿਰਾਗ
ਵੱਖੋ ਵੱਖਰੇ ਰਸਤਿਆਂ ਵੱਲ ਖਿੱਚਦੇ
ਮੈਂ ਚੁਰਾਹੇ 'ਤੇ ਖੜਾ ਹਾਂ ਸੋਚਦਾ
ਕਿੰਨੇ ਟੋਟੇ ਕਰ ਦਿਆਂ ਇਕ ਹੋਂਦ ਦੇ

ਐ ਮਨਾ ਤੂੰ ਬੇਸੁਰਾ ਏਂ ਸਾਜ਼ ਕਿਉਂ
ਏਨੀ ਗੰਧਲੀ ਹੈ ਤੇਰੀ ਆਵਾਜ਼ ਕਿਉਂ
ਸੁਰ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦਾ ਤੂੰ ਕਿਉਂ ਕੀ ਗੱਲ ਹੈ
ਇਲਮ ਦੇ ਮਸਲੇ ਨੇ ਜਾਂ ਇਖਲਾਕ ਦੇ

ਮਨ ਹੈ ਇਕ ਪੁਸਤਕ ਜਿਵੇਂ ਲਿਖ ਹੋ ਰਹੀ
ਜਿਸ ਦਾ ਕੋਈ ਆਦ ਹੈ ਨਾ ਅੰਤ ਹੈ
ਇਕ ਇਬਾਰਤ ਹੈ ਜੋ ਅੰਦਰ ਤੜਪਦੀ
ਵਾਕ ਨੇ ਇਕ ਦੂਸਰੇ ਨੂੰ ਕੱਟਦੇ ।


ਸੁਰਜੀਤ ਪਾਤਰ ✍️