Monday, February 23, 2026

रूह प्यासी कहाँ से आती है...

रूह प्यासी कहाँ से आती है
ये उदासी कहाँ से आती है


है वो यक-सर सुपुर्दगी तो भला
बद-हवासी कहाँ से आती है


तू है पहलू में फिर तिरी ख़ुश्बू
हो के बासी कहाँ से आती है  ।


जौन एलिया ✍️ 

तबस्सुम है वो...

तबस्सुम है वो होंटों पर जो दिल का काम कर जाए
उन्हें इस की नहीं परवा कोई मरता है मर जाए

दुआ है मेरी ऐ दिल तुझ से दुनिया कूच कर जाए
और ऐसी कुछ बने तुझ पर कि अरमानों से डर जाए

जो मौक़ा मिल गया तो ख़िज़्र से ये बात पूछेंगे
जिसे हो जुस्तुजू अपनी वो बेचारा किधर जाए

सहर को सीना-ए-आलम में परतव डालने वाले
तसद्दुक़ अपने जल्वे का मिरा बातिन सँवर जाए

परेशाँ बाल करते हैं उन्हें शोख़ी से मतलब है
बिखरता है अगर शीराज़ा-ए-आलम बिखर जाए

हयात-ए-दाइमी की लहर है इस ज़िंदगानी में
अगर मरने से पहले बन पड़े तो 'जोश' मर जाए 


जोश मलीहाबादी✍️

प्रीपेड मृत्यु संस्कार

A Short Story


Pune के एक बड़े श्मशान घाट में दोपहर के 3 बजे थे।
‘रोहन’ (उम्र 35 वर्ष),
जो अमेरिका की एक बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट था,
अभी-अभी फ्लाइट से उतरकर सीधे श्मशान घाट पहुँचा था।
उसके पिता,
‘सदाशिवराव’ (उम्र 75 वर्ष),
कल रात गुजर गए थे।
रोहन के हाथ में महंगा लैपटॉप बैग था और आँखों पर रेबैन का चश्मा।
उसे पसीना आ रहा था और वह बार-बार घड़ी देख रहा था।
वहाँ ‘मोक्ष इवेंट मैनेजमेंट’ (अंतिम संस्कार करने वाली एजेंसी) का कर्मचारी
‘सुमित’ खड़ा था।
सुमित ने सारी तैयारी कर रखी थी।
लकड़ियाँ सजा दी थीं,
पंडित बुला लिया था, और सदाशिवराव के पार्थिव शरीर को स्नान कराकर तैयार रखा था।
रोहन आया।
उसने पिता के चेहरे की ओर एक नजर डाली।
आँखों से एक-दो आँसू निकल आए।
उसने सुमित से पूछा:
“मिस्टर सुमित,
सब तैयार है ना?
मुझे 6 बजे की रिटर्न फ्लाइट पकड़नी है।
कल मेरी बहुत जरूरी मीटिंग है।
प्लीज़ जल्दी कराइए।”
सुमित को आश्चर्य हुआ।
जिस पिता ने इस बेटे को पाल-पोशकर बड़ा किया,
उस पिता की चिता के पास रुकने के लिए इस बेटे के पास तीन घंटे भी नहीं थे।
सुमित ने शांत होकर सिर हिलाया।
विधि पूरी हुई।
रोहन ने मुखाग्नि दी।
धुएँ के गुबार आसमान में उठ गए।
रोहन ने सुमित को अलग ले जाकर चेकबुक निकाली।
“सुमित, धन्यवाद।
आपने अच्छी व्यवस्था की।
आपका बिल कितना हुआ? 50 हजार? 1 लाख?
राशि बताइए,
मैं अभी चेक दे देता हूँ।
मैं दोबारा नहीं आ पाऊँगा,
अस्थि विसर्जन भी आप ही करवा दीजिए।”
सुमित ने रोहन की ओर देखा।
उसके चेहरे पर एक अजीब-सी मुस्कान थी।
उसने जेब से एक पुरानी फाइल निकाली और रोहन के हाथ में दी।
“साहब, बिल देने की जरूरत नहीं है।
आपका बिल ‘पेड’ है।”
रोहन चौंक गया।
“पेड?
किसने भरा पैसा?
क्या मेरे चाचा ने?”
सुमित बोला:
“नहीं साहब।
पाँच साल पहले सदाशिवराव जी (आपके पिता) हमारे ऑफिस आए थे।
वे बहुत बीमार थे, ठीक से चल भी नहीं पा रहे थे।
उन्होंने मुझसे पूछा था —
‘आपका पैकेज क्या है?
मेरे बेटे को तकलीफ न हो, सब इंतज़ाम कर देंगे ना?’
हमने उन्हें पैकेज बताया।
उन्होंने उसी दिन 50,000 रुपये एडवांस जमा कर दिए थे।
और यह ‘चिट्ठी’ मुझे देकर कहा था —
‘मेरा बेटा आए तो उसे यह दे देना।
और अगर वह न आ सके,
तो आप ही मेरा अंतिम संस्कार कर देना।’”
सुमित ने वह चिट्ठी रोहन को दी।
रोहन ने काँपते हाथों से चिट्ठी खोली।
उसमें सदाशिवराव के काँपते अक्षरों में लिखा था:
“प्रिय रोहन,
बेटा,
मुझे पता है तुम बहुत व्यस्त हो।
अमेरिका में तुम्हें साँस लेने की भी फुर्सत नहीं होती।
मुझे मालूम है कि
मेरी मृत्यु की खबर सुनकर तुम्हें चिंता होगी।
‘छुट्टी मिलेगी या नहीं?
टिकट मिलेगा या नहीं?
मीटिंग का क्या होगा?’
ये सवाल तुम्हारे मन में आएँगे।
बेटा, तुम्हारा समय और तुम्हारा करियर बहुत महत्वपूर्ण है।
मैंने तुम्हें इसलिए पाला है कि तुम दुनिया जीत सको।
एक बूढ़े की लाश के लिए तुम अपना नुकसान मत करना।
इसलिए मैंने अपनी मृत्यु की व्यवस्था पहले ही कर दी है।
एजेंसी को पैसे दे दिए हैं।
वे सब कर देंगे।
तुम आ सको तो अच्छा है,
न आ सको तो भी मुझे कोई शिकायत नहीं।
बस एक विनती है —
जब मैं तुम्हें बचपन में स्कूल छोड़ने जाता था,
तो तुम्हारा हाथ कभी नहीं छोड़ा था।
आज जब तुम मुझे अग्नि दो,
तो तुम्हारा हाथ काँपना नहीं चाहिए।
जल्दी वापस चले जाना।
तुम्हारी पत्नी इंतज़ार कर रही होगी।
तुम्हारा,
पापा।”
चिट्ठी पढ़ते ही रोहन के हाथ से चेकबुक कीचड़ में गिर गई।
उस श्मशान में,
जहाँ लकड़ियों के जलने की आवाज आ रही थी…
वहाँ अब रोहन का अहंकार और करियर का घमंड जलकर राख हो चुका था।
वह घुटनों के बल बैठ गया।
चिल्लाया —
“पापा…!! मुझे माफ कर दीजिए!”
उसने सुमित के पैर पकड़ लिए।
“सुमित,
मुझे अमेरिका नहीं जाना।
मुझे अपने पापा के साथ रहना है!
मैंने करोड़ों रुपये कमाए,
पर मैं तो असली भिखारी निकला!
मेरे पापा ने मरते समय भी मेरी मीटिंग की चिंता की…
और मैं उनके अंतिम दर्शन का भी हिसाब लगा रहा था?”
उस दिन रोहन फ्लाइट नहीं पकड़ सका।
वह वहीं,
जलती चिता के सामने रात भर बैठा रहा।
क्योंकि उसे समझ आ गया था —
*‘प्री-पेड’ सिर्फ सिम कार्ड हो सकता है,पिता का प्रेम नहीं।*
*पिता का प्रेम ‘अनलिमिटेड’ होता है,*
और उसकी कीमत दुनिया की कोई भी करंसी नहीं चुका सकती।
आप दुनिया में कितने भी बड़े बन जाएँ,
कितना भी पैसा कमा लें…
लेकिन जिन माता-पिता ने आपका बचपन सँवारा,
उनके अंतिम सफर में साथ देने से कभी पीछे मत हटिए।
एजेंसी अंतिम संस्कार कर सकती है,
लेकिन आँसू एजेंसी के नहीं होते —
वे अपने खून के रिश्तों के ही होते हैं।



Monday, February 9, 2026

आत्मसमर्पण

मुझे भी युद्ध लड़ना है
किंतु मेरे पास न मिसाइलें हैं
और न ही सैनिकों का जत्था


मुझे नहीं जीतना है कोई देश
न ही कोई क्षेत्र विशेष।


जबकि कुछ नहीं है मेरे पास
सिवाय प्रेम के
तो रख दूँगा अपने हाथ
तुम्हारे हाथों पर और कर दूँगा आत्मसमर्पण


हर बार ज़ंग जीतने के लिए लड़ी जाए
ज़रूरी तो नहीं । 


आदित्य रहबर ✍️ 

गर्माहट

तुम्हारी बाँहों से लिपटते हुए
महसूस किया मैंने
दिसंबर में धूप का निकल आना।


रिश्तों के बीच इतनी गर्माहट तो बची ही रहनी चाहिए
जितनी बची रहती है नमी
अकाल के बावजूद पहाड़ों की तराई में

बचा रहता है चाँद
दिन के उजाले में। 


आदित्य रहबर ✍️ 

रात

रात कल
चुपके से दबे पाँव आई थी मेरे कमरे में
कहा—
कैसी कट रही तुम्हारी रातें ?

चुपचाप ताकता रहा कुछ देर तक उसे
देखा उसके चेहरे पर दो-चार धब्बे इतरा रहे थे
मैंने पूछ दिया—
ये दाग़ कैसे हैं ?

सहम गई
बोली—
इंतज़ार में काटी रातों के निशान हैं
अब तो ये मेरी स्मृतियों के हिस्से हैं
चाहकर भी मिटा नहीं सकती !


मैं अच्छी तरह समझता था
इंतज़ार का अर्थ
पुनः पूछने की इच्छा नहीं हुई

कौन नहीं जानता
इंतज़ार में काटी गई रातें
अमावस्या से भी काली होती हैं


वे धब्बे, धब्बे नहीं थे
आकांक्षाओं की पपड़ियाँ थीं
जो सूख गए हैं
नमी के अभाव में
मेरी आँखों में भी नमी नहीं दिखती
जब झाँकता हूँ उनमें
तो दिखता है रेगिस्तान-सा कुछ
जहाँ चारों तरफ़ रेत ही रेत हैं


जिन्हें इंतज़ार है बरसात का
ताकि मुस्कुरा सके
वे पेड़-पौधे
जिनकी छाँव में हम ढूँढ़ सकें सुकून
जो खो गया है सदियों पहले
इस भाग-दौड़ भरी दुनिया में कहीं । 


आदित्य रहबर ✍️ 

पिता

जब भी किसी पुल से गुज़रता हूँ
याद आते हैं पिता

ज़िंदगी की कितनी ही यात्राएँ
उनके कंधों से होकर गुज़री हैं

पिता के काँधे की लंबाई
दुनिया के किसी भी पुल से लंबी है। 


आदित्य रहबर ✍️ 

स्मृतियाँ

जैसे मृत्यु आती है बिन बताए
और ठंडी पड़ जाती है पूरी देह

तुम भी आना
अपनी स्मृतियों में
ठीक उसी तरह
ठंडी पड़ी देह को एक गर्माहट देने

हमें यह भ्रम तोड़ना होगा कि
देह का ठंडा पड़ जाना ही नहीं होता
मृत्यु का मात्र एक कारण। 


आदित्य रहबर ✍️ 

बहुत बोलने वाली लड़कियाँ

बहुत बोलने वाली लड़कियाँ
काँटा होती हैं
जो चुभती रहती हैं
सभ्य समाज की आँखों में

एक उम्र के बाद चुप रहने लगती हैं
वे लड़कियाँ
और एक समय के बाद,
बना दी जाती हैं
किसी चूल्हे की जलावन। 


आदित्य रहबर ✍️ 

प्रेम

कितना अजीब है—
यह जानते हुए भी किसी के प्रेम में होना
कि हम कभी नहीं मिलेंगे।


इससे भी अजीब है
यह जानते हुए
प्रेम में नहीं होना। 


आदित्य रहबर ✍️