Sunday, April 12, 2026
माना उन तक पहुंचती नहीं तपिश हमारी
पूछ लेते वो बस मिज़ाज मिरा
फ़हमी बदायूँनी की यह प्रसिद्ध शायरी प्रेम में उपेक्षा और उसके कारण होने वाले दर्द को दर्शाती है। इसका अर्थ है कि प्रेमी की बस छोटी सी परवाह (हाल-चाल पूछना) ही दुखी दिल का सबसे बड़ा मरहम बन सकती थी।
शायरी का अर्थ और भावार्थ:
पूछ लेते वो बस मिज़ाज मेरा: अगर वे (प्रेमी/प्रेमिका) बस एक बार मेरा हाल-चाल पूछ लेते।
कितना आसान था इलाज मेरा: तो मेरे दुखी मन और बीमारी का इलाज करना बहुत ही सरल था।
भाव: यह शायराना अंदाज में कहा गया है कि जब इंसान भावनात्मक रूप से टूट जाता है, तो उसे महंगी दवाओं की नहीं, बल्कि अपनों की परवाह की जरूरत होती है।
शायरी का संदर्भ:
यह शेर अक्सर इस बात पर जोर देने के लिए इस्तेमाल किया जाता है कि प्रेम और मानवीय रिश्तों में शब्दों से ज्यादा 'अहसास' और 'समय' महत्वपूर्ण हैं। यह एक भावनात्मक शेर है जो प्रेमी की अनदेखी और उससे पैदा होने वाली कसक को बयां करता है।
जो ज़ाहिर हो जाए वो दर्द कैसा
यह प्रसिद्ध शेर (अक्सर गुलज़ार से जोड़ा जाता है) गहरे भावनात्मक जुड़ाव की बात करता है। इसका अर्थ है कि सच्चा दर्द वह है जिसे शब्दों की ज़रूरत न हो, उसे आँखों से समझा जाए। जो दर्द बताने पर समझ आए, वह दर्द कैसा, और जो आपके मौन या दर्द को बिना कहे न समझ सके, वह हमदर्द (साथी) कैसा। यह खामोशी की भाषा और रूहानी रिश्ते पर जोर देता है।
शायरी का भावार्थ:
"जो ज़ाहिर हो जाए वो दर्द कैसा": सच्चा या गहरा दर्द छिपा हुआ होता है। अगर आपको अपना दुःख शब्दों में बताना पड़ रहा है, तो वह दर्द उतना गहरा नहीं है। जो दर्द शब्दों का मोहताज नहीं, वही सच्चा है।
"जो महसूस न कर सका वो हमदर्द कैसा": हमदर्द का मतलब ही है 'दर्द में साथ देने वाला'। जो आपके दिल का हाल, आपकी आँखों या खामोशी से न समझ सके, वह सच्चा साथी या हमदर्द नहीं हो सकता।
यह शायरी उन रिश्तों पर सवाल उठाती है जहाँ भावनाएं और गहराई कम होती है, और यह सच्चे, निस्वार्थ प्रेम की अपेक्षा करती है।
इक तर्ज़-ए-तग़ाफ़ुल है सो वो उन को मुबारक
इक अर्ज़-ए-तमन्ना है सो हम करते रहेंगे
- style of ignorance
तर्ज़
tarz طَرْز
- तरीक़ा, ढंग, क़ायदा, नियम
- (अवभिव्यक्ति या अर्थ प्रकट करने के लिए), ढंग, अंदाज़
- तरह, समान
- उपेक्षा, ध्यान न देना, बेख़बरी, लापरवाई, असावधानी
- जान-बूझ कर की जाने वाली उपेक्षा या लापरवाही
- सुस्ती
अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपाएँ कैसे
जरें जरें में रब की निगाहे कर्म है
कभी ये नहीं कहना
कि औरों पर ज्यादा और मुझ पर कम है...!!
न जाने कौन सी शिकायतों के हम शिकार हो गए
जितना दिल साफ़ रखा, उतने ही गुनहगार हो गए।
रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ
च्यूंटियाँ
सुरमई रात में
अपने ख़्वाबों को दीवार पर मार कर
पहले तोड़ा
फिर उस की सभी किर्चियाँ
अपने दामन में भर के
समुंदर की मौजों में डाल आए हम
थोड़ी हलचल हुई
दाएरे दाएरे से बिखरने लगे
नक़्श छोड़े बिना
ख़ुशबुओं की तरह
ख़्वाहिशें डूब कर ऐसे मरतीं रहीं
जैसे मरती हैं पैरों तले च्यूंटियाँ ।
नील अहमद ✍️
गुड़िया
खिलौना तो नहीं हूँ मैं
ना मिट्टी का कोई बुत हूँ
कि जब तुम हाथ को मोड़ो नहीं होगी मुझे तकलीफ़
कि जब तुम आँख को फोड़ो तो चीख़ें भी न निकलेंगी
बिना सोचे
बिना देखे मिरी शादी किसी गुड्डे से कर दोगे
मिरे सर में किसी भी नाम का सिंदूर भर दोगे
मुझे मुझ से बिना पूछे मुझी से दूर कर दोगे
सुनो ये जान लो तुम भी
सुनो ये जान लो तुम भी
मुरव्वत छोड़ दी मैं ने
जिसे गुड़िया समझते थे
वो गुड़िया तोड़ दी मैं ने ।
नील अहमद ✍️







