फ़िक्र मर जाए तो फिर जौन का मातम करना
हम जो जिंदा हैं तो फिर 'जौन' की बरसी कैसी ।
जौन एलिया ✍️
यह शेर जौन एलिया (Jaun Elia) के अंदाज़-ए-बयां और उनके 'निहिलिस्टिक' (शून्यवादी) नजरिये को दर्शाता है। यह एक बेहद गहरा और दार्शनिक शेर है, जो इंसान की सोच (फिक्र/चेतना) को उसके अस्तित्व से भी ज्यादा महत्वपूर्ण मानता है।
अर्थ:
इसका मतलब है कि इंसान की असली मौत उसका जिस्म (शरीर) नहीं, बल्कि उसकी 'फिक्र' (सोच, समझ, संवेदना, जमीर) का मर जाना है। जब इंसान के अंदर से सही-गलत की समझ, भावनाएँ, और फिक्र खत्म हो जाए, तब उसके जिस्म के मरने पर मातम (शोक) करना चाहिए, क्योंकि तब तक वह सिर्फ एक ज़िंदा लाश की तरह है।

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