ये कैसी आग है मुझ में कि एक मुद्दत से
तमाशा देख रहा हूँ मैं अपने जलने का
सालिम सलीम ✍️
यह प्रसिद्ध शेर सालिम सलीम (Salim Saleem) द्वारा रचित है, जो खुद को जलते हुए देखने की बेबसी और कशमकश को दर्शाता है। यह एक मशहूर शेर है जो अक्सर रेख़्ता और अन्य शायरी मंचों पर साझा किया जाता है।
भावार्थ:
शायर अपनी ही रूह या हालातों की तपिश से वाकिफ है, लेकिन लंबे समय (मुद्दत) से वो इस कदर बेबस या उदासीन हो चुका है कि खुद को बर्बाद होते हुए एक दर्शक (तमाशबीन) की तरह देख रहा है। यह आत्म-विनाश और बेबसी का गहरा एहसास है।

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