अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपाएँ कैसे
तेरी मर्ज़ी के मुताबिक़ नज़र आएँ कैसे
वसीम बरेलवी ✍️
यह मशहूर शेर प्रोफेसर वसीम बरेलवी की एक लोकप्रिय ग़ज़ल का मतला (शुरुआती शेर) है। इसे दिग्गज ग़ज़ल गायक जगजीत सिंह ने अपनी आवाज़ देकर और भी यादगार बना दिया है।
पूरी ग़ज़ल की कुछ मुख्य पंक्तियाँ -
अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपाएँ कैसे
तेरी मर्ज़ी के मुताबिक़ नज़र आएँ कैसे
घर सजाने का तसव्वुर तो बहुत बाद का है
पहले ये तय हो कि इस घर को बचाएँ कैसे
लाख तलवारें बढ़ी आती हों गर्दन की तरफ़
सर झुकाना नहीं आता तो झुकाएँ कैसे
कोई अपनी ही नज़र से तो हमें देखेगा
एक क़तरे को समुंदर नज़र आएँ कैसे ।
अर्थ:
इस शेर के ज़रिए कवि कहना चाहते हैं कि जो सच हमारे चेहरे पर साफ़ झलक रहा है, उसे छिपाना मुमकिन नहीं है। वे सवाल करते हैं कि हम अपनी असलियत को छोड़कर किसी और (दुनिया या महबूब) की पसंद के हिसाब से खुद को कैसे बदल लें ?

No comments:
Post a Comment