नग़्मा जो है तो रूह में है नै में कुछ नहीं
गर तुझमें कुछ नहीं तो किसी शै में कुछ नहीं।
तेरे लहू की आंच से नरमी है जिस्म की
मय के हज़ार दस्त सही मय में कुछ नहीं।
जिसमें ख़ुलूसे-फिक्र न हो वो सुखन फज़ूल
जिसमें न दिल शरीक हो उस लै में कुछ नहीं।
कशकोले-फ़न उठाके सुए-ख़ुसरवां न जा
अब दस्ते-इख़्तियारे-जमो-कै में कुछ नहीं।
साहिर लुधियानवी ✍️
नै: बांसुरी
कशकोले-फ़न उठाके सुए-खुसरवां न जा: कला का कटोरा उठाकर बादशाहों के पास जाना बेकार है।
अब दस्ते-इख़्तियारे...: अब ईरान के जमशेद और कैकुबाद जैसे राजाओं के बस में कुछ भी नहीं है।
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