Friday, May 8, 2026

दालान में कभी कभी छत पर खड़ा हूँ मैं

दालान  में  कभी  कभी  छत  पर  खड़ा हूँ मैं
सायों  के  इंतिज़ार  में  शब  भर  खड़ा  हूँ मैं

क्या  हो  गया  कि  बैठ  गई  ख़ाक  भी मिरी
क्या  बात  है  कि  अपने  ही ऊपर खड़ा हूँ मैं

फैला   हुआ   है   सामने    सहरा-ए-बे-कनार
आँखों  में  अपनी  ले  के  समुंदर  खड़ा  हूँ  मैं

सन्नाटा   मेरे   चारों   तरफ़    है   बिछा   हुआ
बस दिल की धड़कनों को पकड़ कर खड़ा हूँ मैं

सोया  हुआ  है  मुझ  में  कोई शख़्स आज रात
लगता  है  अपने  जिस्म  से  बाहर  खड़ा  हूँ  मैं

इक  हाथ  में  है  आईना-ए-ज़ात-ओ-काएनात
इक   हाथ  में   लिए   हुए   पत्थर  खड़ा  हूँ  मैं ।









सालिम सलीम ✍️

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