Sunday, April 12, 2026

च्यूंटियाँ

सुरमई रात में
अपने ख़्वाबों को दीवार पर मार कर
पहले तोड़ा
फिर उस की सभी किर्चियाँ
अपने दामन में भर के
समुंदर की मौजों में डाल आए हम
थोड़ी हलचल हुई
दाएरे दाएरे से बिखरने लगे
नक़्श छोड़े बिना
ख़ुशबुओं की तरह
ख़्वाहिशें डूब कर ऐसे मरतीं रहीं
जैसे मरती हैं पैरों तले च्यूंटियाँ ।


नील अहमद ✍️

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