रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ ।
अहमद फ़राज़ ✍️
अहमद फ़राज़ द्वारा रचित यह प्रसिद्ध ग़ज़ल जुदाई के गहरे दर्द, पागलपन की हद तक प्यार, और प्रियतम को किसी भी हाल में (भले ही दुख देने के लिए) वापस बुलाने की बेचैनी को दर्शाती है। यह प्रेम की वह चरम अवस्था है जहाँ प्रेमी, अपमान सहकर भी महबूब की एक झलक पाने के लिए तैयार है।
शायरी के अर्थ का विवरण:
रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ: भले ही हमारे बीच नाराजगी (रंजिश) हो, भले ही तुम मेरा दिल दुखाने आ रही/रहा हो, लेकिन एक बार आ जाओ।
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ: मैं तुम्हें फिर से बिछड़ने का मौका देने को तैयार हूँ, बस एक बार फिर से मेरे पास आकर मुझे छोड़ कर चली/चले जाओ।
भावार्थ: शायर की तड़प इतनी ज्यादा है कि वह जुदाई के दर्द को सहने के लिए तैयार है, बस सामने वाला एक बार मुलाकात कर ले। यह एकतरफा या बेइंतहा प्यार की वह हालत है, जहाँ महबूब की बेवफाई भी मंजूर है, लेकिन उनकी उपस्थिति जरूरी है।

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