Saturday, April 11, 2026

रहिये अब ऐसी जगह, चल कर जहाँ कोई न हो


 

रहिये अब ऐसी जगह, चल कर जहाँ कोई न हो
हम-सुख़न कोई न हो, और हम-ज़बाँ कोई न हो

यह प्रसिद्ध शेर मिर्ज़ा ग़ालिब की मशहूर गज़ल का हिस्सा है, जो भीड़भाड़ और सामाजिक बंधनों से दूर एकांत (सुकून) की तलाश को दर्शाता है। इस शेर में शायर एक ऐसी जगह बसने की बात कर रहा है जहाँ न तो कोई बात करने वाला हो और न ही कोई हमदर्द। 

अर्थ:

हम-सुख़न: बात करने वाला/साथी
हम-ज़बाँ: अपनी भाषा जानने वाला
बे-दर-ओ-दीवार: बिना दरवाज़े और दीवार का (खुली जगह)
हम-साया: पड़ोसी
पासबाँ: रखवाला/हिफाज़त करने वाला
तीमारदार: बीमार की सेवा करने वाला
नौहा-ख़्वाँ: मातम करने वाला/रोना-धोना करने वाला 

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