Saturday, April 11, 2026

उसी को जीने का हक है जो इस ज़माने में


 

उसी को जीने का हक है जो इस ज़माने में 
इधर का लगता रहे और उधर का हो जाए 

वसीम बरेलवी का यह शेर आज के दौर की चालाकी, अवसरवादिता और गिरगिट जैसी फितरत पर तीखा व्यंग्य करता है। इसका अर्थ है कि ज़माने में वही इंसान सुखी और सफल है जो दोगलापन (hypocrisy) अपनाता है, दोनों तरफ़ रिश्ते निभाता है और फायदा देखकर पाला बदल लेता है।

शायरी का अर्थ और विस्तार:

मूल अर्थ: आज के दौर में जीने का हक़ केवल उसी को है जो वफादार होने का नाटक करे ("इधर का लगता रहे") लेकिन मौका पड़ने पर खुद को सुरक्षित रखने के लिए दूसरे पाले में चला जाए ("और उधर का हो जाए")।

भावार्थ: कवि का कहना है कि आज सच्चाई और वफादारी की कोई कद्र नहीं है। जो लोग सीधे या एकनिष्ठ होते हैं, वे पीस दिए जाते हैं। जो लोग चालाक हैं, जो एक जगह से फायदा लेकर दूसरी जगह शामिल हो सकते हैं, वही इस कलयुगी ज़माने में फलते-फूलते हैं।

व्यंग्य: यह शेर राजनीति, रिश्तों और कामकाजी जीवन में व्याप्त स्वार्थ को दर्शाता है, जहाँ इंसान अपने फायदे के लिए अपनी निष्ठा बदलता रहता है। 

संक्षेप में, यह शेर यह बताता है कि आज के ज़माने में 'ईमानदार' होने से बेहतर 'समझदार' (स्वार्थी) होना माना जाता है, क्योंकि वही जीवन जीने के योग्य माना जाता है। 

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