ये कैसी उम्र में आकर मिली हो तुम
बहुत जी चाहता है,
फिर से बो दूँ अपनी आंखें
तुम्हारे ढेर सारे चेहरे उगाऊं,
और बुलाऊँ बारिशों को
बहुत जी है कि फुर्सत हो ... तसब्बुर हो ..!
तसब्बुर में थोड़ी बागवानी हो..!!
मगर जानां....
इक ऐसी उम्र में आकर मिली हो तुम
किसी के हिस्से कि मिटटी नहीं हिलती,
किसी के धूप का हिस्सा नहीं छनता,
मगर क्या क्यारी के पौधे
पास अपने
अब किसी को पाँव रखने के लिए भी
थाह नहीं देते,
ये कैसी उम्र में आकर मिली हो तुम ?
गुलज़ार✍️
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