अहमद फ़राज़ का यह प्रसिद्ध शेर जीवन की नश्वरता और समय के चक्र को दर्शाता है। इसका अर्थ है कि अगर आज विपत्ति या मुश्किल का सामना मैं कर रहा हूँ, तो तुम्हें (दुश्मनों या सत्ता को) खुश नहीं होना चाहिए, क्योंकि समय सबका बदलता है। जब विनाश का समय आएगा, तो हवा किसी का साथ नहीं देगी और सबके चिराग़ (अस्तित्व/सत्ता) बुझेंगे।
शेर का विस्तृत अर्थ:
मैं आज ज़द पे अगर हूँ तो ख़ुश-गुमान न हो: अगर आज मैं मुश्किलात या ज़द (निशाने/लपेट) में हूँ, तो खुश मत हो।
चराग़ सब के बुझेंगे हवा किसी की नहीं: यह समय का चक्र है। जिस तरह आँधी (मुसीबत) किसी खास का लिहाज़ नहीं करती और सबके दीये बुझा देती है, वैसे ही सत्ता या ज़मीन पर वक़्त सबका ख़त्म होता है।
भावार्थ: यह शेर अहंकार और क्षणभंगुरता को ख़त्म करने का संदेश देता है, जो अक्सर राजनीतिक या व्यक्तिगत संदर्भों में इस्तेमाल होता है।

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