मुझे जिससे इश्क़ है
वो मेरे लिए ख़ास है
पर मैं उसके लिए बस एक अजनबी
एक बेनाम एहसास हूँ।
अपने ग़मों को ताक़ पर रखकर भी
सिर्फ़ उसी के बारे में सोचती हूँ
पर वो?
वो तो फ़ुर्सत में भी मुझे याद नहीं करता
क्योंकि उसका मुझसे कोई वास्ता नहीं।
हाँ, कभी-कभी अगर वास्ता पड़ भी जाए
तो वे लम्हे मेरे लिए अमानत बन जाते हैं
दिल की तिजोरी में क़ैद
कुछ पल की रोशनी जैसे।
मैं अक्सर सोचती हूँ
काश! वो पढ़ा-लिखा होता,
काश! वो किताबों से इतर
मेरे दिल के पन्ने भी पढ़ पाता।
अब्दुल रहीम चंदा✍️
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