Sunday, April 12, 2026

ठिठुरते लम्हों की नज़्म

पहाड़ों की नुकीली चोटियों पर
बर्फ़ की परतें जमी हैं
फिसल कर धूप चिकने जिस्म से
गहरे समंदर की तहों में
खो गई है
घने जंगल के सारे पेड़
फ़र्ग़ुल में लपेटे जिस्म अपने
चुप खड़े हैं
ज़मीं के पास सूरज की
अमानत भी नहीं है 

ये यख़-बस्ता मनाज़िर
मेरी ठिठुरी मुट्ठियों में
घुलते जाते हैं
मिरी ठंडी हथेली
गुदगुदी से
खिलखिलाती है ।


शाहिद कलीम✍️

No comments:

Post a Comment