पहाड़ों की नुकीली चोटियों पर
बर्फ़ की परतें जमी हैं
फिसल कर धूप चिकने जिस्म से
गहरे समंदर की तहों में
खो गई है
घने जंगल के सारे पेड़
फ़र्ग़ुल में लपेटे जिस्म अपने
चुप खड़े हैं
ज़मीं के पास सूरज की
अमानत भी नहीं है
ये यख़-बस्ता मनाज़िर
मेरी ठिठुरी मुट्ठियों में
घुलते जाते हैं
मिरी ठंडी हथेली
गुदगुदी से
खिलखिलाती है ।
शाहिद कलीम✍️
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