Saturday, April 4, 2026

साँप को सर पर रखो या पाँव रखो साँप पर

 

साँप को सर पर रखो या पाँव रखो साँप पर, 
दंश का खतरा रहेगा सिर्फ अपने आप पर।

कुछ समय मन की उठी बेचैनियों को दीजिए, 
भाप पानी से उठेगी एक निश्चित ताप पर।

पैंट पीछे से फटी तो शर्ट बाहर कर लिया, 
मुफलिसी ढँकने में बेटा भी गया है बाप पर।

योजनों की दूरियाँ तो भूमिका में कट गई, 
रुक गई बाकी कहानी उँगलियों की नाप पर।

पत्थरों को पूजने में फूल सब तोड़े गए, 
जिंदगी सारी कटी है वक़्त के अभिशाप पर।

हाय हू हा हाय हू हा कर रहे हैं आज वो, 
लोग जो कल हँस रहे थे गैर के संताप पर।

पुण्य की कुछ पंक्तियों को स्वर्ण में ढाला गया, 
और चस्पा कर दिया सारे जहाँ के पाप पर ।


दिवाकर पाण्डेय 'चित्रगुप्त'✍️

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