दिल पे ज़ख़्म खाते हैं जान से गुज़रते हैं
जुर्म सिर्फ़ इतना है उन को प्यार करते हैं
वो जो फेर कर नज़रें पास से गुज़रते हैं
ऐ ग़म-ए-ज़माना हम तुझ को याद करते हैं
वो दयार-ए-जानाँ हो या ज्वार-ए-मय-ख़ाना
गर्दिशें ठहरती हैं हम जहाँ ठहरते हैं
ए'तिबार बढ़ता है और भी मोहब्बत का
जब वो अजनबी बन कर यास से गुज़रते हैं ।
इक़बाल सफ़ीपुरी✍️
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