Tuesday, February 24, 2026

नज़र-नवाज़ नज़ारा बदल न जाए कहीं ...

नज़र-नवाज़ नज़ारा बदल न जाए कहीं 
ज़रा सी बात है मुँह से निकल न जाए कहीं

वो देखते हैं तो लगता है नीव हिलती है 
मिरे बयान को बंदिश निगल न जाए कहीं

यूँ मुझ को ख़ुद पे बहुत ए'तिबार है लेकिन 
ये बर्फ़ आँच के आगे पिघल न जाए कहीं

चले हवा तो किवाड़ों को बंद कर लेना 
ये गर्म राख शरारों में ढल न जाए कहीं

तमाम रात तिरे मय-कदे में मय पी है 
तमाम उम्र नशे में निकल न जाए कहीं

कभी मचान पे चढ़ने की आरज़ू उभरी 
कभी ये डर कि ये सीढ़ी फिसल न जाए कहीं

ये लोग होमो-हवन में यक़ीन रखते हैं 
चलो यहाँ से चलें हाथ जल न जाए कहीं ।


दुष्यंत कुमार✍️

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