नज़र-नवाज़ नज़ारा बदल न जाए कहीं
ज़रा सी बात है मुँह से निकल न जाए कहीं
वो देखते हैं तो लगता है नीव हिलती है
मिरे बयान को बंदिश निगल न जाए कहीं
यूँ मुझ को ख़ुद पे बहुत ए'तिबार है लेकिन
ये बर्फ़ आँच के आगे पिघल न जाए कहीं
चले हवा तो किवाड़ों को बंद कर लेना
ये गर्म राख शरारों में ढल न जाए कहीं
तमाम रात तिरे मय-कदे में मय पी है
तमाम उम्र नशे में निकल न जाए कहीं
कभी मचान पे चढ़ने की आरज़ू उभरी
कभी ये डर कि ये सीढ़ी फिसल न जाए कहीं
ये लोग होमो-हवन में यक़ीन रखते हैं
चलो यहाँ से चलें हाथ जल न जाए कहीं ।
दुष्यंत कुमार✍️
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