रक़्स करती हुई
गुनगुनाती हुई
मुस्कुराती हुई
ज़िंदगी क्या हुई
जगमगाते हुए शहर को क्या हुआ
रौशनी क्या हुई
फूल जैसे बदन
रंग-ओ-बू के चमन
प्यार के साहिलों की फ़ज़ा
फूल की डालियों से
लिपटती हवा
चश्म-ए-एहसास के सामने
दूर तक आज कुछ भी नहीं
अहद-ओ-पैमाँ
के रिश्तों को किस की नज़र खा गई
दोस्ती क्या हुई
कितने गुल-रंग पैकर
मिले ख़ाक में
कितने कड़ियल जवाँ
अपने सीनों पे
ज़ख़्मों के तम्ग़े सजाए
शहादत के
दर्जे पे फ़ाएज़ हुए
हर तरफ़ है धुआँ
शोर-ए-आह-ओ-फ़ुग़ाँ
वहशत-ए-बे-अमाँ
दश्त ओ दर
हैं सवाली
बताए कोई
ज़िंदगी क्या हुई
रक़्स करती हुई
गुनगुनाती हुई
मुस्कुराती हुई ज़िंदगी क्या हुई ।
गुलनार आफ़रीन✍️
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