Monday, February 9, 2026

किताबें

किसी मुल्क की क़ाबिलियत
वहाँ की किताबों से आँकी जा सकती है
धर्मस्थलों या इमारतों से नहीं


किताबों का अलग एक अपना धर्म होता है
जहाँ विज्ञान साँस लेता है
मानवता मुस्कुराती है।

किताबें हर युग में
युद्धों के ख़िलाफ़ खड़ी रही हैं
परमाणु-परीक्षण से ज़्यादा
इस दुनिया को किताबें पलटने की ज़रूरत है

किताबों से बड़ा युद्ध नहीं इस दुनिया में
बर्बरता के ख़िलाफ़। 


आदित्य रहबर ✍️ 

प्यास का मज़हब...

भूख
भूख होती है
प्यास
प्यास।

अक्सर मैंने ऐसा सोचा
किंतु दुनिया मेरे मन से कहाँ चलती है?
पानी कभी गंगा
तो कभी आब-ए-ज़म-ज़म हो जाता है

भूख
कभी पेट की
मज़हब की
कट्टरता की
तो कभी वासना की हो जाती है

किसने बनाई यह रीत
ये क़ायदे-कानून?

प्यास सरहद और मज़हब
देखकर तो नहीं लगती

आब-ए-ज़मज़म हो या गंगा
आख़िर पानी ही तो है
प्यास ही तो बुझाती है

नफ़रत की रेत
ऐसे ही उड़ती रही
तो न यहाँ पानी बचेगा
न मज़हब
न हम
सिवाय बंजर पड़ी भूमि के


जहाँ वसंत नहीं आएगा
फूल नहीं खिलेंगे
अगर कुछ होंगे
तो सिर्फ़ काँटे
और काँटे कभी प्यास नहीं बुझाते
वे तो सिर्फ़ चुभना जानते हैं। 


आदित्य रहबर ✍️ 

पूर्णता

जिनके हिस्से नहीं आया प्रेम
अंततः उन्होंने ही दिया दुनिया को

प्रेम का सबसे सुंदर संदेश
प्रेम में असफल रहे प्रेमियों ने ही लिखे

दुनिया के सबसे सुंदर प्रेमपत्र
रास्ता भटक गई नदियों ने ही की

नए शहरों की खोज
जहाँ रिक्तता है

वहीं पूर्णता है। 


आदित्य रहबर ✍️

Sunday, February 8, 2026

नज़दीकियों में दूर का मंज़र तलाश कर...


नज़दीकियों में दूर का मंज़र तलाश कर 
जो हाथ में नहीं है वो पत्थर तलाश कर

सूरज के इर्द-गिर्द भटकने से फ़ाएदा
दरिया हुआ है गुम तो समुंदर तलाश कर

तारीख़ में महल भी है हाकिम भी तख़्त भी 
गुमनाम जो हुए हैं वो लश्कर तलाश कर

रहता नहीं है कुछ भी यहाँ एक सा सदा
दरवाज़ा घर का खोल के फिर घर तलाश कर

कोशिश भी कर उमीद भी रख रास्ता भी चुन 
फिर इस के बा'द थोड़ा मुक़द्दर तलाश कर ।


निदा फ़ाज़ली साहब ✍️

Saturday, February 7, 2026

लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में ...


लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में 
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में

और जाम टूटेंगे इस शराब-ख़ाने में 
मौसमों के आने में मौसमों के जाने में

हर धड़कते पत्थर को लोग दिल समझते हैं 
उम्र बीत जाती हैं दिल को दिल बनाने में 
फ़ाख़्ता की मजबूरी ये भी कह नहीं सकती 
कौन साँप रखता है उस के आशियाने में

दूसरी कोई लड़की ज़िंदगी में आएगी 
कितनी देर लगती है उस को भूल जाने में


बशीर बद्र ✍️

Friday, February 6, 2026

मैं और मेरी तन्हाई, अक्सर ये बातें करते हैं...

मैं और मेरी तन्हाई, अक्सर ये बातें करते हैं..
तुम होती तो कैसा होता, तुम ये कहती, तुम वो कहती 
तुम इस बात पे हैरां होती, तुम उस बात पे कितनी हँसती
तुम होती तो ऐसा होता, तुम होती तो वैसा होता
मैं और मेरी तन्हाई, अक्सर ये बातें करते हैं..

ये कहाँ आ गये हम, यूँही साथ साथ चलते..  
तेरी बाहों में है जानम, मेरे जिस्म-ओ-जान पिघलते..

ये रात है, या तुम्हारी ज़ुल्फ़ें खुली हुई हैं
है चाँदनी तुम्हारी नज़रों से, मेरी राते धुली हुई हैं
ये चाँद है, या तुम्हारा कँगन 
सितारे हैं या तुम्हारा आँचल
हवा का झोंका है, या तुम्हारे बदन की खुशबू 
ये पत्तियों की है सरसराहट 
के तुमने चुपके से कुछ कहा 
ये सोचता हूँ मैं कबसे गुमसुम
कि जबकी मुझको भी ये खबर है
कि तुम नहीं हो, कहीं नहीं हो
मगर ये दिल है कि कह रहा है
तुम यहीं हो, यहीं कहीं हो..

तू बदन है मैं हूँ साया, तू ना हो तो मैं कहाँ हूँ
मुझे प्यार करने वाले, तू जहाँ है मैं वहाँ हूँ
हमें मिलना ही था हमदम, इसी राह पे निकलते
ये कहाँ आ गये हम

मेरी साँस साँस महके, कोई भीना भीना चन्दन
तेरा प्यार चाँदनी है, मेरा दिल है जैसे आँगन
कोइ और भी मुलायम, (मेरी शाम ढलते ढलते - २)
ये कहाँ आ गये हम

मजबूर ये हालात, इधर भी है उधर भी
तन्हाई के ये रात, इधर भी है उधर भी
कहने को बहुत कुछ है, मगर किससे कहें हम
कब तक यूँही खामोश रहें, और सहें हम
दिल कहता है दुनिया की हर इक रस्म उठा दें
दीवार जो हम दोनो में है, आज गिरा दें
क्यों दिल में सुलगते रहें, लोगों को बता दें
हां हमको मुहब्बत है, मोहब्बत है, मोहब्बत है
अब दिल में यही बात, इधर भी है, उधर भी

ये कहाँ आ गये हम, ये कहाँ आ गये हम ।


जावेद अख्तर ✍️ 

आ आवारा हैं गलियों में मैं और मेरी तन्हाई...

आ आवारा हैं गलियों में मैं और मेरी तन्हाई
जाएँ तो कहाँ जाएँ
जाएँ तो कहाँ जाएँ हर मोड़ पे रुस्वाई
मैं और मेरी तन्हाई, मैं और मेरी तन्हाई


ये फूल से चेहरे हैं हँसते हुए गुलदस्ते
कोई भी नहीं अपना बेगाने हैं सब रस्ते
राहें भी तमाशाई राही भी तमाशाई
मैं और मेरी तन्हाई, मैं और मेरी तन्हाई


अरमान सुलगते हैं सीने में चिता जैसे
क़ातिल नज़र आती है दुनिया की हवा जैसे
रोती है मेरे दिल पर बजती हुई शहनाई
मैं और मेरी तन्हाई, मैं और मेरी तन्हाई


आकाश के माथे पर तारों का चराग़ां है
पहलू में मगर मेरे ज़ख्मों का गुलिस्तां है
आँखों से लहू टपका दामन में बहार आई
मैं और मेरी तन्हाई, मैं और मेरी तन्हाई
मैं और मेरी तन्हाई, मैं और मेरी तन्हाई 


अली सरदार जाफरी✍️

Thursday, February 5, 2026

भली सी एक शक्ल थी

भले दिनों की बात है
भली सी एक शक्ल थी
न ये कि हुस्न-ए-ताम हो
न देखने में आम सी

न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे
मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे

कोई भी रुत हो उस की छब
फ़ज़ा का रंग-रूप थी
वो गर्मियों की छाँव थी
वो सर्दियों की धूप थी

न मुद्दतों जुदा रहे
न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो
न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद
न ये कि इज़्न-ए-आम हो

न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ
कि सादगी गिला करे
न इतनी बे-तकल्लुफ़ी
कि आइना हया करे


न इख़्तिलात में वो रम
कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें
न इस क़दर सुपुर्दगी
कि ज़च करें नवाज़िशें
न आशिक़ी जुनून की
कि ज़िंदगी अज़ाब हो
न इस क़दर कठोर-पन
कि दोस्ती ख़राब हो

कभी तो बात भी ख़फ़ी
कभी सुकूत भी सुख़न
कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ
कभी उदासियों का बन

सुना है एक उम्र है
मुआमलात-ए-दिल की भी
विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या
फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी

सो एक रोज़ क्या हुआ
वफ़ा पे बहस छिड़ गई
मैं इश्क़ को अमर कहूँ
वो मेरी ज़िद से चिड़ गई

मैं इश्क़ का असीर था
वो इश्क़ को क़फ़स कहे
कि उम्र भर के साथ को
वो बद-तर-अज़-हवस कहे

शजर हजर नहीं कि हम
हमेशा पा-ब-गिल रहें
न ढोर हैं कि रस्सियाँ
गले में मुस्तक़िल रहें

मोहब्बतों की वुसअतें
हमारे दस्त-ओ-पा में हैं
बस एक दर से निस्बतें
सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं

मैं कोई पेंटिंग नहीं
कि इक फ़्रेम में रहूँ
वही जो मन का मीत हो
उसी के प्रेम में रहूँ

तुम्हारी सोच जो भी हो
मैं उस मिज़ाज की नहीं
मुझे वफ़ा से बैर है
ये बात आज की नहीं

न उस को मुझ पे मान था
न मुझ को उस पे ज़ोम ही
जो अहद ही कोई न हो
तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी
सो अपना अपना रास्ता
हँसी-ख़ुशी बदल दिया
वो अपनी राह चल पड़ी
मैं अपनी राह चल दिया


भली सी एक शक्ल थी
भली सी उस की दोस्ती ।
अब उस की याद रात दिन
नहीं, मगर कभी कभी ।


अहमद फ़राज़ ✍️




Tuesday, February 3, 2026

शाम कठिन है रात कड़ी है...


शाम कठिन है रात कड़ी है
आओ कि ये आने की घड़ी है

वो है अपने हुस्न में यकता
देख कहाँ तक़दीर लड़ी है

मैं तुम को ही सोच रहा था
आओ तुम्हारी उम्र बड़ी है

काश कुशादा दिल भी रखता
जिस घर की दहलीज़ बड़ी है

फिर बिछड़े दो चाहने वाले
फिर ढोलक पर थाप पड़ी है

वो पहुँचा इमदादी बन कर
जब जब हम पर बिफर पड़ी है

शहर में है इक ऐसी हस्ती
जिस को मिरी तकलीफ़ बड़ी है

हँस ले 'रहबर' वो आए हैं
रोने को तो उम्र पड़ी है  ।


राजेंद्र नाथ रहबर ✍️ 

क्या आज उन से अपनी मुलाक़ात हो गई...

क्या आज उन से अपनी मुलाक़ात हो गई
सहरा पे जैसे टूट के बरसात हो गई

वीरान बस्तियों में मिरा दिन हुआ तमाम
सुनसान जंगलों में मुझे रात हो गई

करती है यूँ भी बात मोहब्बत कभी कभी
नज़रें मिलीं न होंट हिले बात हो गई

ज़ालिम ज़माना हम को अगर दे गया शिकस्त
बाज़ी मोहब्बतों की अगर मात हो गई

हम को निगल सकें ये अँधेरों में दम कहाँ
जब चाँदनी से अपनी मुलाक़ात हो गई

बाज़ार जाना आज सफल हो गया मिरा
बरसों के बा'द उन से मुलाक़ात हो गई 


राजेंद्र नाथ रहबर✍️