ये फ़ासला
जो तुम्हारे और मेरे दरमियाँ है
हर इक ज़माने की दास्ताँ है
न इब्तिदा है
न इंतिहा है
मसाफ़तों का अज़ाब साँसों का दाएरा है
न तुम कहीं हो
न मैं कहीं हूँ
तलाश रंगीन वाहिमा है
सफ़र में लम्हों का कारवाँ है
ये फ़ासला!
जो तुम्हारे और मेरे दरमियाँ है
यही तलब है यही जज़ा
है यही ख़ुदा है ।
निदा फ़ाज़ली ✍️
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