नील गगन पर बैठे
कब तक
चांद सितारों से झांकोगे
पर्वत की ऊंची चोटी से
कब तक दुनिया देखोगे
आदर्शों के बंद ग्रंथों में
कब तक आराम करोगे
मेरा छप्पर
टपक रहा है
बनकर सूरज
इसे सुखाओ
खाली है
आटे का कनस्तर
बनकर गेहूं
इसमें आओ
मां का चश्मा
टूट गया है
बनकर शीशा
इसे बनाओ
चुप चुप हैं आँगन में बच्चे
बनकर गेंद
इन्हें बहलाओ
शाम हुई है चांद उगाओ
पेड़ हिलाओ
हवा चलाओ
काम बहुत हैं
हाथ बटाओ अल्ला मिंया
मेरे घर भी आ ही जाओ
अल्ला मिंया... ।
निदा फ़ाज़ली ✍️
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