Tuesday, March 17, 2026

वो जो शायर था...

वो जो शायर था, 
चुप सा रहता था 
बहकी बहकी सी बातें करता था 
आँखें कानों पे रख के सुनता था 
गूँगी ख़ामोशियों की आवाज़ें 
जम्अ करता था चाँद के साए 
गीली गीली सी नूर की बूंदें 
ओक में भर के खड़खड़ाता था 
रूखे रूखे से रात के पत्ते 
वक़्त के इस घनेरे जंगल में 
कच्चे पक्के से लम्हे चुनता था

हाँ, वही, वो अजीब सा शायर 
रात को उठ के कुहनियों के बल 
चाँद की ठोड़ी चूमा करता है!!

चाँद से गिर के मर गया है वो 
लोग कहते हैं खुद-कुशी की है । 


गुलज़ार ✍️ 

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