नज़र से फूल चुनती है नज़र आहिस्ता आहिस्ता
मोहब्बत रंग लाती है मगर आहिस्ता आहिस्ता
दु'आएँ दे रहे हैं पेड़ मौसम जोगिया सा है
तुम्हारा साथ है जब से हर इक मंज़र नया सा है
हसीं लगने लगी हर रहगुज़र आहिस्ता आहिस्ता
बहुत अच्छे हो तुम फिर भी हमें तुम से हया क्यों है
तुम्हीं बोलो हमारे दरमियाँ ये फ़ासला क्यों है
मज़ा जब है कि तय हो ये सफ़र आहिस्ता आहिस्ता
हमेशा से अकेले-पन में कोई मुस्कुराता है
ये रिश्ता प्यार का है आसमाँ से बन के आता है
मगर होती है दिल को ये ख़बर आहिस्ता आहिस्ता ।
निदा फ़ाज़ली ✍️
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