Monday, March 23, 2026

कौन आया रास्ते आईना-ख़ाने हो गए ...

कौन आया रास्ते आईना-ख़ाने हो गए 
रात रौशन हो गई दिन भी सुहाने हो गए

क्यूँ हवेली के उजड़ने का मुझे अफ़सोस हो 
सैकड़ों बे-घर परिंदों के ठिकाने हो गए 

जाओ उन कमरों के आईने उठा कर फेंक दो 
बे-अदब ये कह रहे हैं हम पुराने हो गए

पलकों पर ये आँसू प्यार की तौहीन थे 
उसकी आँखों से गिरे मोती के दाने हो गए

ये भी मुमकिन है कि मैं ने उस को पहचाना न हो 
अब उसे देखे हुए कितने ज़माने हो गए  ।


बशीर बद्र ✍️ 

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