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तुम्हारी बाँहों से लिपटते हुएमहसूस किया मैंनेदिसंबर में धूप का निकल आना।
रिश्तों के बीच इतनी गर्माहट तो बची ही रहनी चाहिएजितनी बची रहती है नमीअकाल के बावजूद पहाड़ों की तराई मेंबचा रहता है चाँददिन के उजाले में।
आदित्य रहबर ✍️
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