और कुछ दिन यहाँ रुकने का बहाना मिलता
इस नए शहर में कोई तो पुराना मिलता
मैं तो जो कुछ भी था जितना भी था सब मिट्टी था
तुम अगर ढूँडते मुझ में तो ख़ज़ाना मिलता
मुझ को हँसने के लिए दोस्त मयस्सर हैं बहुत
काश रोने के लिए भी कोई शाना मिलता
मैं कड़ी धूप में भटका हूँ तुम्हारी ख़ातिर
तुम जो मिल जाते तो मौसम भी सुहाना मिलता
मेरे आँसू तिरी आँखों से छलकते किसी रोज़
तेरी ज़ुल्फ़ों से किसी दिन मिरा शाना मिलता
तुम ने जाते हुए देखा ही नहीं मेरी तरफ़
वर्ना मुझ में तुम्हें अपना ही फ़साना मिलता
साथ रहने की चुकाई है बड़ी क़ीमत भी
छोड़ देते जो तुझे हम तो ज़माना मिलता
खेत पर लगने लगे पहरे ख़ज़ानों की तरह
यूँ न होता तो परिंदों को भी दाना मिलता
ले गए हम ही उसे मंदिर-ओ-मस्जिद की तरफ़
वर्ना हर राह में उस का ही ठिकाना मिलता ।
शकील आज़मी ✍️
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