Sunday, January 18, 2026
आदत
साँस लेना भी कैसी आदत है
जिए जाना भी क्या रिवायत है
कोई आहट नहीं बदन में कहीं
कोई साया नहीं है आँखों में
पाँव बेहिस हैं चलते जाते हैं
इक सफ़र है जो बहता रहता है
कितने बरसों से कितनी सदियों से
जिए जाते हैं जिए जाते हैं
आदतें भी अजीब होती हैं
गुलज़ार ✍️
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