मेरे हम-नफ़स, मेरे हम-नवा,
मुझे दोस्त बन के दग़ा न दे
मैं हूँ दर्द-ए-इश्क़ से जाँ-बलब,
मुझे ज़िन्दगी की दुआ न दे
मुझे छोड़ दे मेरे हाल पर,
तेरा क्या भरोसा है चारागर
ये नगीज़-ए-शब-ए-फ़िराक़ है,
इसे तू ही अब न बढ़ा न दे
मुझे दोस्त बन के दग़ा न दे...मेरे हम-नफ़स...
जिसे कह दिया तू ने ज़हर-ए-ग़म,
तो हमीं ने पी ली हँस के हम
जो कहा तू ने ये ज़हर है,
तो मुझे न ज़हर-ए-वफ़ा न दे
मुझे दोस्त बन के दग़ा न दे...मेरे हम-नफ़स...
मैं हूँ दर्द-ए-इश्क़ से जाँ-बलब...
जो कहा तू ने ये ज़हर है,
तो मुझे न ज़हर-ए-वफ़ा न दे
मेरे हम-नफ़स, मेरे हम-नवा,
मुझे दोस्त बन के दग़ा न दे ।
शकील बदायूंनी ✍️
No comments:
Post a Comment