छुट्टी का दिन है। दिसम्बर माह की गहरी धुंध को परे धकेल कर गुनगुनी सी धूप निकली है मि. क्वातरा और उनकी पत्नी छत पर बैठे इस धूप का आनंद ले रहे हैं । देह को कुछ राहत सी मिल रही है। मिसेज क्वातरा के घुटनों में दर्द रहता को घुटनों तक उठा लेती है और किसी तेल की मालिश करने लगती है। वह अपनी धोती
“यह दर्द तो मेरी जान निकाल कर ही छोडेगा। आपको तो कुछ चिंता ही नहीं रहती ।
कितनी बार कहा है, शहर के किसी अच्छे डाक्टर से इलाज करवा दो। मगर आपको तो
फुर्सत ही कहाँ है । " मिसेज क्वातरा घुटनों की मालिश करते करते शिकवा करती है। " चिंता क्यों नहीं है। मुझे तो हर पल तुम्हारी ही चिंता रहती है। हड्डी व जोड़ रोग विशेषज्ञ हैं-डा. चोधरी। शहर के मशहूर डाक्टर हैं। साहब के वाकिफ हैं। मैंने उनसे बात की है। शनिवार को बुलाया है उन्होंने ।" मि. क्वातरा ने अपनी बात स्पष्ट की।
आफिस के काम के बोझ व जिम्मेदारियों से दबे मि. क्वातरा समय से पहले ही बूढा गए हैं। सिर का एक एक बाल सफेद हो चुका है। आंखों पर चश्मे चढ चुके हैं। चेहरे पर चिंताओं का जाल सा फैला है। दो बेटियां हैं जिनकी शादी अभी करनी है।
"हाय रा.. म ।" मि. क्वातरा खाट पर लेटते लेटते रूक जाते हैं और पेट को दोनों हाथों
से दबा लेते हैं।
“क्या हुआ है ? पेट दर्द हुआ है ? " मिसेज क्वातरा तेल की शीशी एक तरफ रख कर उठती हुई बुडबुडाती है, "कितनी बार कहा है, अपना भी कुछ ध्यान रखा करो मगर आपको तो....।
"क्या करूँ ? घर के खर्चे ही चैन नहीं लेने देते। इस महीने तन्ख्वाह में से दवा के लिए कुछ रूपये बचा कर रखे थे। आज आफिस से लोटते वक्त रेखा मिल गई। बहिन का रिश्ता है। फिर एक ही तो है। कहती भाई से इतना भी नहीं हुआ..."
मिसेज क्वातरा खाट पर पति के पास बैठ गई । " चलो कोई बात नहीं जिम्मेदारियां तो निभानी ही पडती हैं। मैने भी कुछ रूपये बचा कर रखे हैं। आप मेरे ईलाज को तो रहने दो। अपना इलाज करवा लो। आप से ही तो घर गृहस्थी.. । " मिसेज क्वातरा अपने घुटनों को दबाती दबाती हिम्मत बंधाते हुए कहती है।


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